वनवन्यजीव
Trending

शून्य से शिखर तक: सरिस्का ने बदल दिया भारत के बाघ संरक्षण का इतिहास

18 वर्षों में दुनिया के सबसे सफल टाइगर री-इंट्रोडक्शन मॉडल के रूप में उभरा सरिस्का; अब भारत के भविष्य के बाघ प्रबंधन की दिशा यहीं से होगी तय

सुमित जुनेजा

नेचर टाइम्स, जयपुर

कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न बन चुका सरिस्का आज उसी दुनिया के सामने सिर ऊँचा करके खड़ा है। जिस जंगल से वर्ष 2004 तक संगठित शिकारियों ने एक-एक कर सभी बाघों का अस्तित्व समाप्त कर दिया था, उसी सरिस्का ने आज यह सिद्ध कर दिया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक प्रबंधन, समर्पित वनकर्मी, स्थानीय समुदाय का विश्वास और दीर्घकालिक संरक्षण नीति एक साथ खड़ी हो जाए, तो प्रकृति स्वयं अपना भविष्य लिखना शुरू कर देती है।

 

बाघ पुनर्स्थापन (Tiger Re-introduction) के 18 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर सरिस्का में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला केवल एक स्मृति समारोह नहीं थी। यह भारत में बाघ संरक्षण की नई दिशा तय करने वाला राष्ट्रीय मंथन था। इसी मंच से स्पष्ट संदेश दिया गया कि अब संरक्षण केवल बाघों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सक्रिय प्रबंधन, वैज्ञानिक हस्तक्षेप, कॉरिडोर विकास, स्थानीय समुदाय की भागीदारी, रोग निगरानी, पुनर्वास और पारिस्थितिक संतुलन को एक साथ लेकर आगे बढ़ना होगा।

कार्यशाला में केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव, राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल एवं विशेष सचिव सुशील कुमार अवस्थी, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के अतिरिक्त महानिदेशक एवं सदस्य सचिव संजय कुमार, इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस के महानिदेशक डॉ. एस.पी. यादव, राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं हॉफ अरिजीत बनर्जी, देशभर के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, फील्ड डायरेक्टर, वैज्ञानिक तथा संरक्षण विशेषज्ञ एक मंच पर उपस्थित रहे।

 

यह कार्यशाला केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं थी, बल्कि आने वाले दशकों में भारत के बाघ संरक्षण की नीति का प्रारूप भी प्रस्तुत कर गई।

सरिस्का ने बदल दी भारत की संरक्षण व्यवस्था

एनटीसीए के अतिरिक्त महानिदेशक एवं सदस्य सचिव संजय कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि सरिस्का में बाघों का समाप्त होना देश की संरक्षण व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा झटका था। इसी घटना के बाद भारत में संरक्षण ढांचे में ऐतिहासिक बदलाव हुए। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को नई शक्ति मिली, वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो की स्थापना हुई, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संशोधन किए गए, वैज्ञानिक टाइगर मॉनिटरिंग लागू हुई तथा प्रबंधन प्रभावशीलता मूल्यांकन जैसी व्यवस्थाएं विकसित हुईं।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि सरिस्का जैसी घटना नहीं होती तो संभवतः भारत में बाघ संरक्षण का आधुनिक ढांचा इतनी तेजी से विकसित नहीं हो पाता।

18 वर्ष पहले लौटी थी जंगल की खोई हुई धड़कन

28 जून 2008 का वह दिन भारतीय वन्यजीव संरक्षण इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। रणथम्भौर से हेलीकॉप्टर के माध्यम से लाए गए पहले नर बाघ एसटी-1 ने दोपहर 1 बजकर 12 मिनट पर सरिस्का की धरती पर कदम रखा। कुछ ही दिनों बाद बाघिन एसटी-2, जिसे बाद में “राजमाता” के नाम से जाना गया, भी यहां पहुंची।

वहीं से शुरू हुआ वह सफर जिसने आज सरिस्का को 56 बाघों तक पहुंचा दिया है।

आज सरिस्का केवल पुनर्स्थापित आबादी नहीं, बल्कि भविष्य में अन्य टाइगर रिजर्व को बाघ उपलब्ध कराने वाला “सोर्स पॉपुलेशन” बनने की दिशा में अग्रसर है।

भूपेंद्र यादव ने दिया संरक्षण का नया मंत्र

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भविष्य का संरक्षण केवल बाघों की संख्या बढ़ाने का अभियान नहीं होगा।उन्होंने कहा कि भारत को अब विज्ञान आधारित संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान, प्राकृतिक खेती, जल संरक्षण, जैव विविधता, सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना को भी संरक्षण नीति में शामिल करना होगा। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कुनो में चीता परियोजना स्थानीय समुदाय के सहयोग से सफल हुई, उसी प्रकार सरिस्का की सफलता भी यह सिद्ध करती है कि संरक्षण का सबसे मजबूत आधार जनता का विश्वास होता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत आज दुनिया को संरक्षण का नया मॉडल दे रहा है, जहां विज्ञान और संवेदना साथ-साथ चलते हैं।

राजस्थान मॉडल की हुई राष्ट्रीय सराहना

राजस्थान के वन मंत्री संजय शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार ने वन संरक्षण को विभागीय कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनभागीदारी का अभियान बनाया है। उन्होंने कहा कि पौधारोपण के साथ पौधों का संरक्षण, वन मेलों के माध्यम से स्थानीय आजीविका, वन चौकियों का आधुनिकीकरण, लाइव मॉनिटरिंग, बेहतर पुनर्वास नीति और सीएसआर आधारित गांव विकास जैसे कदमों ने राजस्थान को राष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान दिलाई है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सरिस्का वर्ष 2026 के अंत तक 60 बाघों का आंकड़ा पार करेगा और आने वाले वर्षों में यह देश के सबसे महत्वपूर्ण बाघ स्रोत क्षेत्रों में शामिल होगा।

सक्रिय प्रबंधन ही भविष्य : विशेषज्ञों की एक राय

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल सुशील कुमार अवस्थी ने कहा कि सरिस्का की सफलता का सबसे बड़ा आधार सक्रिय प्रबंधन, आवास सुधार, कॉरिडोर संरक्षण और वैज्ञानिक योजना है।

वहीं इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस के महानिदेशक डॉ. एस.पी. यादव ने कहा कि अब समय आ गया है कि देश के सभी संभावित बाघ क्षेत्रों में क्षमता निर्माण, वन हेल्थ, रोग निगरानी, प्रशिक्षित वनकर्मी और आधुनिक निगरानी प्रणाली को प्राथमिकता दी जाए। उन्होंने सरिस्का और पन्ना को दुनिया के सबसे सफल बाघ पुनर्स्थापन मॉडल बताते हुए कहा कि आने वाले समय में कई देश भारत के अनुभवों से सीख लेकर अपने यहां बड़े मांसाहारी वन्यजीवों के पुनर्वास कार्यक्रम चलाएंगे।

तीन दस्तावेज़, जो तय करेंगे भविष्य

कार्यशाला के दौरान “रोड मैप ऑन एक्टिव मैनेजमेंट ऑफ टाइगर्स इन इंडिया”, “री-इंट्रोडक्शन एंड रिकवरी ऑफ टाइगर्स इन इंडिया” तथा प्रोजेक्ट चीता की वार्षिक रिपोर्ट का विमोचन किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यही दस्तावेज देश के टाइगर रिजर्व के लिए नीति निर्धारण की आधारशिला बनेंगे।

 सरिस्का अब केवल अभयारण्य नहीं, राष्ट्रीय संरक्षण प्रयोगशाला है

कभी बाघविहीन होने का दंश झेलने वाला सरिस्का आज भारत की संरक्षण क्षमता का प्रतीक बन चुका है। यह सफलता केवल बाघों की संख्या बढ़ने की कहानी नहीं, बल्कि उन हजारों वनकर्मियों, वैज्ञानिकों, स्थानीय ग्रामीणों, नीति निर्माताओं और संरक्षणवादियों के साझा प्रयासों की कहानी है जिन्होंने असंभव दिखने वाले लक्ष्य को संभव बनाया। आज जब भारत मानव-वन्यजीव संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता संरक्षण जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच खड़ा है, तब सरिस्का का मॉडल यह संदेश देता है कि सफल संरक्षण केवल जंगलों में नहीं, बल्कि सरकार, विज्ञान और समाज के साझा संकल्प में जन्म लेता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!