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जयपुर: 200 फीट सड़क और वन भूमि विवाद, NGT तक पहुंच सकता है मामला

जगतपुरा में फॉरेस्ट क्लियरेंस की शर्तों पर सवाल, वन एवं पर्यावरण कानूनों के उल्लंघन के आरोपों के बीच मामला NGT तक पहुंचने की तैयारी में

नेचर टाइम्स न्यूज डेस्क
जयपुर। राजधानी जयपुर के तेजी से विकसित होते जगतपुरा क्षेत्र में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने वन भूमि, पर्यावरणीय स्वीकृतियों, सरकारी निगरानी और शहरी विकास के पूरे तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विभिन्न केंद्रीय और राज्य स्तरीय विभागों को भेजी गई एक विस्तृत शिकायत में दावा किया गया है कि एपेक्स हॉस्पिटल से जगतपुरा आरओबी तक जाने वाली 200 फीट सड़क के लिए वर्ष 2009 में जिस वन भूमि को स्वीकृति प्रदान की गई थी, उस स्वीकृति की मूल शर्तों का समय के साथ कथित रूप से उल्लंघन हुआ और आज उसी क्षेत्र में व्यावसायिक गतिविधियों तथा निर्माण कार्यों का विस्तार दिखाई दे रहा है।

 

शिकायत में कहा गया है कि वर्ष 2009 में भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा लगभग 0.858 हेक्टेयर वन भूमि को सड़क निर्माण के उद्देश्य से वन स्वीकृति प्रदान की गई थी। इस स्वीकृति के साथ कई महत्वपूर्ण शर्तें भी जोड़ी गई थीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि भूमि की वैधानिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होगा और जिस उद्देश्य के लिए वन स्वीकृति दी गई है, उसी उद्देश्य के लिए भूमि का उपयोग किया जाएगा। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि वर्षों बाद जब उन्होंने राजस्व अभिलेखों, स्थल निरीक्षण और उपलब्ध दस्तावेजों का अध्ययन किया तो कई ऐसे तथ्य सामने आए जो इन शर्तों के पालन पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। 

दस्तावेज़ों में दावा किया गया है कि जिस भूमि को केवल सड़क निर्माण के लिए उपयोग किया जाना था, उसके आसपास और कथित रूप से उसी स्वीकृत क्षेत्र से जुड़े हिस्सों में कई व्यावसायिक निर्माण विकसित हो गए। शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया है कि सड़क के दोनों ओर स्थायी व्यावसायिक ढांचे, शोरूम, कॉफी आउटलेट और बहुमंजिला निर्माण कार्य दिखाई दे रहे हैं। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि सड़क निर्माण के लिए दी गई वन स्वीकृति की भूमि पर या उससे जुड़े क्षेत्र में अन्य उपयोग की अनुमति किस आधार पर दी गई। 

शिकायत में सबसे गंभीर बिंदुओं में से एक भूमि की वैधानिक स्थिति से जुड़ा हुआ है। आरोप लगाया गया है कि वन स्वीकृति के समय जिस भूमि को वन भूमि के रूप में संरक्षित रखा जाना था, उसकी स्थिति में बाद के वर्षों में बदलाव दिखाई देता है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि वन स्वीकृति की मूल भावना के विपरीत स्थिति हो सकती है। यदि किसी भी स्तर पर वन भूमि के अभिलेखों में परिवर्तन हुआ है तो यह जांच का विषय बन सकता है कि यह परिवर्तन कब, कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ। 

 

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू निगरानी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। शिकायत में यह प्रश्न भी उठाया गया है कि यदि वर्षों से निर्माण गतिविधियां चल रही थीं तो संबंधित विभागों ने समय रहते इन पर ध्यान क्यों नहीं दिया। दस्तावेज़ों में उल्लेख किया गया है कि कुछ निर्माण ऐसे स्थानों पर स्थित हैं जो वन विभाग की स्थानीय निगरानी व्यवस्था से बहुत दूर नहीं हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नियमित निरीक्षण हुए, यदि हुए तो उनमें क्या पाया गया और यदि अनियमितताएं थीं तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। 

शिकायत में यह भी कहा गया है कि वन स्वीकृति की शर्तों के अनुसार सड़क के दोनों ओर हरित क्षेत्र विकसित किया जाना था तथा वृक्षारोपण और संरक्षण कार्य सुनिश्चित किए जाने थे। लेकिन स्थल की वर्तमान स्थिति को लेकर यह आरोप लगाया गया है कि कई स्थानों पर हरित क्षेत्र के स्थान पर निर्माण गतिविधियां दिखाई देती हैं। यदि यह स्थिति वास्तविक है तो यह केवल वन स्वीकृति के अनुपालन का विषय नहीं रहेगा, बल्कि शहरी पर्यावरण प्रबंधन की विफलता के रूप में भी देखा जा सकता है। 

दस्तावेज़ों में कुछ विशिष्ट व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और निर्माणाधीन भवनों का भी उल्लेख किया गया है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि ये निर्माण उस क्षेत्र में स्थित हैं जहां वन स्वीकृति की शर्तों का पालन होना चाहिए था। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा नहीं की गई है, लेकिन शिकायत में प्रस्तुत फोटो, नक्शे, खसरा विवरण और उपग्रह चित्रों को आधार बनाकर विस्तृत जांच की मांग की गई है। 

शिकायतकर्ता पक्ष का दावा

इस मामले को उठाने वाली नाहरगढ़ वन एवं वन्य जीव सुरक्षा एवं सेवा समिति का दावा है कि उपलब्ध अभिलेखों, राजस्व रिकॉर्ड, वन स्वीकृति की शर्तों और स्थल निरीक्षण से प्राप्त तथ्यों के आधार पर प्रथमदृष्टया वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 तथा अन्य संबंधित विधिक प्रावधानों के उल्लंघन के संकेत दिखाई देते हैं। समिति का कहना है कि प्रकरण की गंभीरता और संभावित पर्यावरणीय प्रभाव को देखते हुए मामले को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), सेंट्रल ज़ोन भोपाल के समक्ष ले जाने की तैयारी की जा रही है, ताकि स्वतंत्र जांच के माध्यम से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके। समिति का यह भी कहना है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो पर्यावरणीय क्षति का आकलन कर जिम्मेदार व्यक्तियों एवं अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

यह मामला केवल एक सड़क या कुछ भवनों का नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा प्रश्न छिपा हुआ है कि जब किसी परियोजना को वन भूमि पर अनुमति दी जाती है तो उसके बाद उस अनुमति की निगरानी कौन करता है? क्या वन स्वीकृति मिलने के बाद वर्षों तक उसकी शर्तों की समीक्षा होती है? क्या किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा यह जांचा जाता है कि भूमि का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए हो रहा है जिसके लिए अनुमति दी गई थी? जगतपुरा का यह मामला इन सभी प्रश्नों को एक साथ सामने लेकर आया है। 

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है तो यह केवल स्थानीय स्तर का मामला नहीं रहेगा। इससे राज्य में वन स्वीकृति प्रक्रियाओं, भूमि उपयोग परिवर्तन, विभागीय समन्वय और पर्यावरणीय निगरानी व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता महसूस हो सकती है। क्योंकि यदि किसी भी वन स्वीकृति के बाद धीरे-धीरे उसका मूल उद्देश्य बदल जाता है तो यह देश की पर्यावरणीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत माना जाएगा। 

अब इस पूरे मामले में सबसे बड़ी निगाह उन संस्थाओं पर है जिन्हें यह शिकायत भेजी गई है। केंद्रीय सशक्त समिति (CEC), पर्यावरण मंत्रालय, राजस्थान सरकार, वन विभाग, जयपुर विकास प्राधिकरण, राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण मंडल और जिला प्रशासन जैसे कई महत्वपूर्ण संस्थानों के समक्ष यह मामला पहुंच चुका है। आने वाले समय में यदि इस पर उच्च स्तरीय जांच होती है तो यह तय हो सकेगा कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है और क्या वास्तव में वन स्वीकृति की शर्तों का उल्लंघन हुआ है या नहीं। 

“शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि प्रकरण से जुड़े दस्तावेज वन प्रशासन के वरिष्ठ स्तर तक पहुंचाए गए, जहां मामले को संज्ञान में लिया गया।”

फिलहाल इतना तय है कि जगतपुरा की 200 फीट सड़क का यह मामला केवल एक स्थानीय शिकायत नहीं रह गया है। यह मामला विकास, पर्यावरण, वन संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही के उस चौराहे पर खड़ा दिखाई देता है जहां से निकलने वाला हर उत्तर भविष्य की कई परियोजनाओं की दिशा तय कर सकता है। 

अब यह मामला केवल जगतपुरा की 200 फीट सड़क तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह है कि यदि सड़क निर्माण के लिए स्वीकृत वन भूमि के आसपास वर्षों में व्यावसायिक गतिविधियों का इतना बड़ा स्वरूप विकसित हुआ है तो इसकी निगरानी किसने की, जिम्मेदारी किसकी है और क्या वन स्वीकृति की मूल शर्तों का पालन हुआ? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में होने वाली जांच और संबंधित एजेंसियों की कार्रवाई से ही सामने आ पाएंगे।

 

 इस मामले से उठ रहे 5 बड़े सवाल

क्या वन स्वीकृति केवल सड़क निर्माण के लिए दी गई थी?

क्या भूमि की वैधानिक स्थिति में कोई परिवर्तन हुआ?

क्या सड़क के दोनों ओर विकसित व्यावसायिक गतिविधियां स्वीकृति की शर्तों के अनुरूप हैं?

क्या संबंधित विभागों ने समय-समय पर निगरानी की?

यदि उल्लंघन हुआ तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

(नोट: यह रिपोर्ट शिकायत में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध दस्तावेजों और प्रस्तुत तथ्यों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र सरकारी जांच और आधिकारिक पुष्टि अभी शेष है।)

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