नेचर टाइम्स विशेष रिपोर्ट
रिपोर्ट : सुमित जूनेजा | जयपुर वन्यजीव डेस्क
जयपुर, 12 मई 2026। राजधानी जयपुर के जंगलों में वन्यजीवों की बढ़ती हलचल और बदलते इकोसिस्टम को लेकर ग्रीष्मकालीन वन्यजीव संख्या आकलन 2026 की रिपोर्ट ने कई बड़े संकेत दिए हैं। जयपुर प्रादेशिक वन क्षेत्र, नाहरगढ़ जैविक उद्यान, झालाना लेपर्ड रिजर्व और आमागढ़ लेपर्ड रिजर्व से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि जयपुर अब केवल पर्यटन शहर नहीं बल्कि तेजी से विकसित हो रहा एक बड़ा “अर्बन वाइल्डलाइफ लैंडस्केप” बन चुका है। रिपोर्ट में लेपर्ड, हाइना, सियार, डेजर्ट फॉक्स, सांभर, नीलगाय, लंगूर और मोर जैसी प्रजातियों की उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की गई है।

वन विभाग के फील्ड स्टाफ द्वारा वाटर हॉल पद्धति और फील्ड मॉनिटरिंग के आधार पर तैयार किए गए आंकड़ों के अनुसार नाहरगढ़ जैविक उद्यान क्षेत्र में सर्वाधिक 62 पैंथर या लेपर्ड दर्ज किए गए। इनमें 26 नर, 7 मादा, 1 शावक और 28 अज्ञात श्रेणी के लेपर्ड शामिल हैं। वहीं इसी क्षेत्र में 69 हाइना, 49 सियार और 24 डेजर्ट फॉक्स दर्ज होना यह दर्शाता है कि जयपुर का नाहरगढ़ क्षेत्र अब बड़े शिकारी वन्यजीवों का अत्यंत सक्रिय कॉरिडोर बन चुका है।
रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा नीलगाय का सामने आया। नाहरगढ़ क्षेत्र में 417 नीलगाय दर्ज की गईं, जिनमें 118 नर, 222 मादा और 62 बच्चे शामिल हैं। इसके अलावा 86 सांभर, 289 हनुमान लंगूर, 50 सेही, 22 जंगली सूअर और 1804 मोर दर्ज किए गए। मोरों की यह संख्या पूरे परिक्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सुरक्षित आवासीय परिस्थितियों का संकेत मानी जा रही है।

झालाना लेपर्ड रिजर्व के आंकड़े भी बेहद महत्वपूर्ण रहे। यहां कुल 17 लेपर्ड दर्ज किए गए, जिनमें 12 नर, 4 मादा और 1 अज्ञात श्रेणी का लेपर्ड शामिल रहा। वहीं 22 हाइना, 81 नीलगाय, 17 सांभर और 19 शिकारी पक्षियों की मौजूदगी दर्ज की गई। हालांकि चौंकाने वाली बात यह रही कि झालाना क्षेत्र में हनुमान लंगूर शून्य दर्ज किए गए, जबकि चीतल की संख्या केवल 3 रही। विशेषज्ञ इसे बढ़ते प्रिडेटर प्रेशर और सीमित शिकार आधार से जोड़कर देख रहे हैं।

आमागढ़ लेपर्ड रिजर्व में भी वन्यजीव गतिविधियां तेजी से बढ़ती दिखाई दीं। यहां कुल 10 लेपर्ड दर्ज किए गए, जिनमें 6 नर, 1 शावक और 3 अज्ञात श्रेणी के लेपर्ड शामिल हैं। आमागढ़ में 21 हाइना, 8 डेजर्ट फॉक्स, 19 सेही, 40 नीलगाय, 12 सांभर और 29 लंगूर दर्ज किए गए। खास बात यह रही कि आमागढ़ क्षेत्र में लेपर्ड शावक की उपस्थिति ने यहां प्रजनन गतिविधियों की पुष्टि की है, जो इस क्षेत्र के स्थायी लेपर्ड आवास बनने की ओर संकेत करती है।

नाहरगढ़ अभयारण्य के पृथक आकलन में भी 27 लेपर्ड, 27 सियार, 12 डेजर्ट फॉक्स, 160 नीलगाय, 183 लंगूर और 26 सांभर दर्ज किए गए। रिपोर्ट में यह भी उल्लेखनीय रहा कि गोडावण, सारस और कई दुर्लभ पक्षी प्रजातियां शून्य दर्ज हुईं, जो ग्रासलैंड और खुले प्राकृतिक आवासों में लगातार बढ़ते दबाव की ओर संकेत करती हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार जयपुर के जंगलों में लेपर्ड और हाइना की बढ़ती संख्या भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती भी बढ़ा सकती है। लगातार शहरी विस्तार, पर्यटन दबाव और कॉरिडोर बाधाओं के बीच इतने बड़े शिकारी वन्यजीव नेटवर्क का सक्रिय रहना वन विभाग के लिए बड़ी जिम्मेदारी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल पर्यटन मॉडल पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि वैज्ञानिक मॉनिटरिंग, शिकार आधार प्रबंधन, कॉरिडोर सुरक्षा और रात्रिकालीन वन्यजीव गतिविधियों पर हाई-टेक निगरानी की आवश्यकता तेजी से बढ़ेगी।
इन आंकड़ों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जयपुर का जंगल केवल “लेपर्ड सफारी” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्थान के सबसे संवेदनशील और तेजी से बदलते वन्यजीव परिदृश्यों में शामिल हो चुका है, जहां हर वर्ष बढ़ती वन्यजीव संख्या भविष्य की नई चुनौतियों और संभावनाओं दोनों की कहानी कह रही है।




