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“जंगल सफारी के नाम पर डिजिटल खेल?”

सरकारी पोर्टल के समान नामों से सक्रिय निजी वेबसाइटों और ऑनलाइन सूचीकरणों ने बढ़ाए सवाल, क्या वन्यजीव पर्यटन के राजस्व तंत्र में लग रही सेंध?

 

“जंगल सफारी के नाम पर डिजिटल खेल?”

सरकारी नामों जैसी वेबसाइटों और ऑनलाइन सूचीकरणों ने बढ़ाए सवाल, क्या वन्यजीव पर्यटन के राजस्व तंत्र में लग रही सेंध?

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▪ सरकारी ओबीएमएस पोर्टल के बावजूद इंटरनेट पर सक्रिय समान नामों वाले निजी मंच

▪ गूगल सूचीकरण और वेबसाइटों के जरिए पर्यटकों के भ्रमित होने की आशंका

▪ विशेषज्ञों ने डिजिटल सत्यापन और साइबर निगरानी मजबूत करने की मांग उठाई

▪ वन्यजीव पर्यटन की ऑनलाइन व्यवस्था में पारदर्शिता पर उठे सवाल

▪ पर्यटन राजस्व और उपभोक्ता विश्वास दोनों को लेकर बढ़ी चिंता

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विशेष रिपोर्ट : सुमित जुनेजा

नेचर टाइम्स, जयपुर

दिनांक : 19 मई 2026

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जयपुर। राजस्थान सरकार एक ओर पर्यटन और वन्यजीव पर्यटन को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। राज्य सरकार द्वारा हाल ही में राजस्थान पर्यटन विभाग के साथ मिलकर विकसित किया गया ओबीएमएस पोर्टल इसी दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, जिसके माध्यम से कोई भी आम नागरिक स्वयं ऑनलाइन जंगल सफारी, पर्यटन स्थल और अन्य पर्यटन गतिविधियों की आधिकारिक बुकिंग कर सकता है। मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा भी लगातार यह दावा कर रहे हैं कि डिजिटल बुकिंग व्यवस्था और ओबीएमएस प्रणाली के जरिए राज्य सरकार के राजस्व में वृद्धि हो रही है तथा पर्यटन व्यवस्था अधिक पारदर्शी बन रही है। लेकिन इसी बीच वन्यजीव पर्यटन से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म और निजी वेबसाइटों का तेजी से फैलता नेटवर्क अब बड़े सवाल खड़े करने लगा है।

इंटरनेट और गूगल खोज प्रणाली पर कई ऐसे निजी पोर्टल और व्यापारिक सूचीकरण सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, जिनके नाम और प्रस्तुति सरकारी वन्यजीव स्थलों से अत्यधिक मेल खाते हैं। जानकारों का कहना है कि कुछ मामलों में कथित रूप से सरकारी सफारी स्थलों या उनसे जुड़े परिसरों के पते का उपयोग कर गूगल व्यापार सत्यापन प्रक्रिया पूरी कर ली जाती है, जिसके बाद वह सूचीकरण “सत्यापित” रूप में ऑनलाइन दिखाई देने लगता है। आम पर्यटक कई बार इसे आधिकारिक व्यवस्था समझ बैठता है और सीधे उन्हीं मंचों के माध्यम से संपर्क और भुगतान कर देता है।


विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश मामलों में ऐसे निजी मंच वास्तविक टिकट सरकारी पोर्टल से ही बुक करते हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार पहले से डिजिटल और सीधी बुकिंग व्यवस्था उपलब्ध करा चुकी है, तब समान नामों और समान पहचान वाले निजी मंचों के जरिए होने वाली यह समानांतर व्यवस्था आखिर किस दिशा में जा रही है? जानकारों के अनुसार यदि पर्यटक सीधे सरकारी पोर्टल की बजाय भ्रमित होकर निजी माध्यमों की ओर जा रहे हैं, तो इससे न केवल उपभोक्ता भ्रम की स्थिति बनती है बल्कि राज्य सरकार की डिजिटल पर्यटन नीति और राजस्व व्यवस्था पर भी अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।

फाइल फोटो

वन्यजीव पर्यटन और साइबर क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल पर्यटन का विषय नहीं बल्कि “डिजिटल पहचान” और “डिजिटल पारदर्शिता” का भी बड़ा मामला बन चुका है। यदि किसी निजी मंच की प्रस्तुति ऐसी हो जिससे सामान्य व्यक्ति उसे सरकारी अथवा अधिकृत मंच समझ बैठे, तो भविष्य में यह उपभोक्ता संरक्षण और साइबर निगरानी दोनों के लिए चुनौती बन सकता है। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि वन्यजीव पर्यटन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आधिकारिक और निजी मंचों के बीच स्पष्ट अंतर होना अत्यंत आवश्यक है।

जानकारों का कहना है कि राजस्थान जैसे राज्य, जहां रणथंभौर, झालाना लेपर्ड रिजर्व, सरिस्का टाइगर रिजर्व, मुकुंदरा, रामगढ़ विषधारी और अन्य वन्यजीव पर्यटन स्थलों पर लगातार पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है, वहां डिजिटल बुकिंग व्यवस्था की विश्वसनीयता और पारदर्शिता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को अब आधिकारिक पोर्टलों के लिए स्पष्ट सत्यापन प्रणाली, विशेष डिजिटल पहचान चिह्न और साइबर निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करना चाहिए, ताकि पर्यटक किसी भी प्रकार के भ्रम से बच सकें।
साइबर कानून विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी मंच की डिजिटल प्रस्तुति इस प्रकार की हो जिससे आम व्यक्ति उसे सरकारी मंच समझ बैठे, तो संबंधित एजेंसियां तकनीकी और कानूनी स्तर पर उसकी जांच कर सकती हैं। हालांकि किसी भी मंच के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष केवल सक्षम एजेंसी की जांच और विधिक प्रक्रिया के बाद ही तय होता है।
आज स्थिति यह है कि एक तरफ राज्य सरकार डिजिटल पर्यटन व्यवस्था को मजबूत कर सीधे राजस्व बढ़ाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर वन्यजीव पर्यटन से जुड़े समान नामों, समान पहचान और समान प्रस्तुति वाले निजी डिजिटल मंचों की बढ़ती संख्या ने नई बहस को जन्म दे दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में स्पष्ट डिजिटल नीति, सख्त सत्यापन व्यवस्था और उपभोक्ता जागरूकता अभियान नहीं चलाए गए तो भविष्य में यह मुद्दा राज्य के पर्यटन राजस्व, डिजिटल पारदर्शिता और उपभोक्ता विश्वास तीनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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