
जयपुर/भीलवाड़ा/भोपाल, 14 अप्रैल 2026: राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में सामने आया वन भूमि प्रकरण अब केवल अवैध कटाई का मामला नहीं रह गया है बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता हुआ एक बड़ा पर्यावरणीय मुद्दा बन चुका है National Green Tribunal की सेंट्रल ज़ोन बेंच, भोपाल में दायर ओरिजिनल एप्लिकेशन संख्या 03/2026 में सामने आए तथ्यों और जांच रिपोर्टों ने यह स्पष्ट किया है कि शाहपुरा रेंज और आसींद रेंज के अंतर्गत आरक्षित एवं संरक्षित वन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर पेड़ों को जड़ से उखाड़ा गया।

मामले में याचिकाकर्ता राजेन्द्र तिवारी द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार भीलवाड़ा वन मंडल के शाहपुरा रेंज स्थित घास पिलामागरा (Protected Forest) तथा आसींद रेंज स्थित नारायणपुरा बीड़ (Reserved Forest) में अवैध कटाई का बड़ा खुलासा हुआ है जहां नारायणपुरा बीड़ में लगभग 58 हेक्टेयर आरक्षित वन क्षेत्र तथा घास पिलामागरा में करीब 10.67 हेक्टेयर संरक्षित वन क्षेत्र प्रभावित पाया गया जबकि संपूर्ण घटनाक्रम का विस्तार लगभग 250 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र तक फैला हुआ बताया गया है।
प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और न्यायालय में प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर तत्कालीन डीएफओ (डिप्टी कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट) गौरव गर्ग, डीएफओ/वन अधिकारी राहुल जगाड़िया, एसीएफ (Assistant Conservator of Forests) पायल माथुर तथा आरएफओ (Range Forest Officer) प्रभुराम धुन सहित अन्य अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाए गए हैं वहीं निजी व्यक्ति पीर मोहम्मद का नाम भी इस पूरे प्रकरण में सामने आया है जिसकी भूमिका की जांच संबंधित एजेंसियों द्वारा की जा रही है आरोप है कि इन अधिकारियों और संबंधित व्यक्ति द्वारा 10 से 15 जेसीबी मशीनों के माध्यम से योजनाबद्ध तरीके से पेड़ों को जड़ से उखाड़ा गया और वन भूमि को गैर-वन उपयोग में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया जो Forest Conservation Act, 1980 का उल्लंघन है।
जांच रिपोर्ट में इस अवैध गतिविधि से राज्य को लगभग ₹1.31 करोड़ का आर्थिक नुकसान आंका गया है जबकि पर्यावरणीय दृष्टि से यह क्षति कहीं अधिक व्यापक मानी जा रही है रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि इस मामले में अन्य अधिकारी और व्यक्ति भी शामिल हो सकते हैं जिनकी विस्तृत जांच आवश्यक है।
13 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति शियो कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त और तत्काल कार्रवाई की जाए तथा पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई संबंधित अधिकारियों और निजी व्यक्ति पीर मोहम्मद से वसूली जाए ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि कार्रवाई को शीघ्रता से अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।
राज्य के वन विभाग की ओर से ट्रिब्यूनल को बताया गया कि मामले में एफआईआर दर्ज कर दी गई है विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रारंभ कर दी गई है और कई अधिकारियों को निलंबित किया गया है अब तक कुल आठ अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जानकारी सामने आई है जिनमें एक आईएफएस अधिकारी दो क्षेत्रीय वन अधिकारी (RFO) तीन फॉरेस्टर और दो सहायक वन संरक्षक (ACF) शामिल हैं साथ ही मामला भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB), राजस्थान को सौंपा गया है जहां आगे की जांच और चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया जारी है।
ट्रिब्यूनल ने पहले दिए गए निर्देशों के तहत प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) राजस्थान को भी सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने और जांच को निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं साथ ही तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने और अगली सुनवाई 16 जुलाई 2026 को प्रस्तुत होने के निर्देश दिए गए हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मामला केवल अवैध कटाई तक सीमित नहीं है बल्कि यह वन संरक्षण कानूनों के पालन प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा एक व्यापक मुद्दा बन चुका है भीलवाड़ा वन मंडल के शाहपुरा और आसींद क्षेत्र में सामने आया यह प्रकरण अब राज्य स्तर पर एक बड़ी पर्यावरणीय चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है जहां अब निगाहें आगामी सुनवाई और जांच के अंतिम निष्कर्षों पर टिकी हैं कि जिम्मेदारी किस स्तर तक तय होती है और दोषियों के विरुद्ध वास्तविक सख्त कार्रवाई होती है या नहीं।
सुमित जुनेजा
विशेष संवाददाता, Nature Times



