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धौलपुर में 30+ काले हिरण दिखे, चम्बल अभयारण्य में पहली बार रिकॉर्ड

धौलपुर के समोना क्षेत्र में वन्यजीव गणना के दौरान 30 से अधिक काले हिरण पहली बार दर्ज, चम्बल क्षेत्र में बढ़ती जैव विविधता का संकेत।

विशेष रिपोर्ट: राकेश गोस्वामी | नेचर टाइम्स, धौलपुर

राजस्थान के धौलपुर जिले से इस समय वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बेहद सकारात्मक और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य के अंतर्गत आने वाले समोना नाका क्षेत्र में हाल ही में आयोजित वन्यजीव गणना के दौरान 30 से अधिक काले हिरण (ब्लैकबक) देखे गए हैं। यह केवल एक सामान्य साइटिंग नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी में हो रहे सकारात्मक बदलावों का मजबूत संकेत है। खास बात यह है कि धौलपुर में पहली बार काले हिरणों की उपस्थिति को आधिकारिक रूप से गणना के आंकड़ों में दर्ज किया गया है, जो इस पूरे घटनाक्रम को और भी महत्वपूर्ण बना देता है।

फाइल फोटो

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, काला हिरण घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र की एक अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण प्रजाति है। इसकी उपस्थिति यह दर्शाती है कि क्षेत्र में प्राकृतिक संतुलन बेहतर स्थिति में है। काला हिरण एक मध्यम आकार का अत्यंत आकर्षक मृग होता है, जिसमें स्पष्ट लैंगिक भिन्नता देखने को मिलती है—जहां वयस्क नर गहरे भूरे से काले रंग के होते हैं और उनके सुंदर सर्पिल सींग होते हैं, वहीं मादा हल्के पीले-भूरे रंग की होती है और सामान्यतः बिना सींग की होती है। यह प्रजाति मुख्य रूप से खुले घास के मैदान, झाड़ीदार और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में रहना पसंद करती है और घास व कोमल वनस्पतियों पर निर्भर रहती है।

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धौलपुर के डीएफओ आशीष व्यास ने इस मामले में अहम जानकारी देते हुए बताया कि समोना नाका, जहां ये काले हिरण देखे गए हैं, वह इलाका उत्तर प्रदेश की सीमा से सटा हुआ है और चम्बल नदी के किनारे स्थित है। उन्होंने बताया कि इससे पहले धौलपुर में काले हिरणों की उपस्थिति कभी भी आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई थी। लेकिन इस बार वन्यजीव गणना के दौरान इनकी संख्या को विधिवत दर्ज किया गया है, जो अपने आप में एक नई और विशेष उपलब्धि है।

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उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इन काले हिरणों का यह समूह संभवतः उत्तर प्रदेश के घासभूमि क्षेत्रों से आकर समोना क्षेत्र में पहुंचा है। चूंकि यह इलाका सीमा से सटा हुआ है, इसलिए वन्यजीवों का एक राज्य से दूसरे राज्य में प्राकृतिक आवागमन सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि चम्बल के आसपास का यह क्षेत्र अब काले हिरणों के लिए अनुकूल आवास बनता जा रहा है।
काला हिरण एक सामाजिक प्रजाति है, जो आमतौर पर समूहों में रहती है। इन समूहों का आकार मौसम और भोजन की उपलब्धता के अनुसार बदलता रहता है। ऐतिहासिक रूप से राजस्थान में यह प्रजाति काफी व्यापक रूप से पाई जाती थी, लेकिन समय के साथ इसके आवास सिकुड़ते चले गए और अब यह सीमित क्षेत्रों में ही दिखाई देती है। हालांकि, हाल के वर्षों में संरक्षण प्रयासों के चलते कुछ क्षेत्रों में इसकी संख्या में धीरे-धीरे वृद्धि भी देखी जा रही है।

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धौलपुर और चम्बल अभयारण्य क्षेत्र की बात करें तो यहां काले हिरण के अलावा नीलगाय, चीतल, सांभर, चौसिंगा और चिंकारा जैसे कई अन्य मृग भी पाए जाते हैं, जो इस पूरे क्षेत्र को जैव विविधता के लिहाज से बेहद समृद्ध बनाते हैं। वन विभाग द्वारा लगातार गश्त, अवैध शिकार पर नियंत्रण, प्राकृतिक आवासों का संरक्षण, जल स्रोतों का विकास और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से संरक्षण कार्यों को मजबूती दी जा रही है। इन सतत प्रयासों का ही परिणाम है कि अब काला हिरण जैसी संवेदनशील प्रजातियां भी इस क्षेत्र में दोबारा दिखाई देने लगी हैं।

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इसी के साथ, ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन के दौरान लगाए गए कैमरा ट्रैप्स से भी कुछ महत्वपूर्ण संकेत मिले हैं। डीएफओ आशीष व्यास ने बताया कि इन कैमरा ट्रैप्स में कई स्थानों पर दुर्लभ प्रजाति कैराकल की संभावित उपस्थिति दर्ज की गई है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक पूरी रिपोर्ट तैयार होकर सामने नहीं आती, तब तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की जा सकती।
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक वन्यजीव गणना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि अगर संरक्षण के प्रयास लगातार और सही दिशा में किए जाएं, तो लुप्तप्राय और संवेदनशील प्रजातियां भी अपने पुराने आवासों में वापसी कर सकती हैं। धौलपुर के समोना क्षेत्र में काले हिरणों की यह पहली आधिकारिक उपस्थिति न केवल पर्यावरणीय संतुलन की बहाली का प्रतीक है, बल्कि यह आने वाले समय में इस क्षेत्र को एक महत्वपूर्ण वाइल्डलाइफ टूरिज्म हॉटस्पॉट के रूप में भी स्थापित कर सकती है।

धौलपुर से आई यह खबर एक बड़ा संकेत देती है—

घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र, जिसे अक्सर नजरअंदाज किया जाता है, अब फिर से जीवंत हो रहा है।

काला हिरण जैसे संवेदनशील जीवों की वापसी यह दर्शाती है कि चम्बल का यह क्षेत्र अब केवल नदी और घड़ियाल के लिए ही नहीं, बल्कि घासभूमि वन्यजीवों के लिए भी एक सुरक्षित आश्रय बनता जा रहा है।

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