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झुंझुनूं वन मंडल में आखिर चल क्या रहा है? एक तरफ लाखों के गबन के आरोप, दूसरी तरफ बिना अनुमति सड़क निर्माण में आठ मौतें!

सरकारी रसीदों और लकड़ी नीलामी में वित्तीय अनियमितताओं से लेकर छापोली हादसे तक, दो गंभीर प्रकरणों ने राजस्थान वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल।

नेचर टाइम्स | सुमित जुनेजा, विशेष संवाददाता

जयपुर/झुंझुनूं। राजस्थान का झुंझुनूं वन मंडल इन दिनों दो गंभीर प्रकरणों को लेकर सवालों के घेरे में है। एक तरफ सरकारी रसीदों, लकड़ी की नीलामी और निविदाओं में लाखों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला है, जिसकी जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से कराने का निर्णय लिया गया है। दूसरी तरफ बीते सोमवार, 2 नवंबर 2026 को छापोली गांव में वन विभाग की संरक्षित भूमि पर कथित रूप से बिना अनुमति चल रहे सड़क निर्माण के दौरान करंट लगने से आठ मजदूरों की मौत हो गई और पांच अन्य घायल हो गए। दोनों घटनाएं अलग-अलग हैं, लेकिन एक ही वन मंडल में सामने आए इन मामलों ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर झुंझुनूं वन मंडल में प्रशासनिक निगरानी और नियमों का पालन किस स्तर पर हो रहा है?

लाखों की राशि का हिसाब सवालों में, सरकारी रसीदों से लेकर नीलामी तक अनियमितताओं के आरोप

मुख्य वन संरक्षक, जयपुर की 2 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में झुंझुनूं वन मंडल की सरकारी रसीद पुस्तक संख्या 0486760, लकड़ी की नीलामी और निविदा प्रक्रिया से संबंधित गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार 14 लाख रुपये की अधिकतम बोली वाली नीलामी की पत्रावली कार्यालय में उपलब्ध नहीं थी। सरकारी रसीदों पर संदिग्ध हस्ताक्षर, राजकोष में राशि जमा नहीं होने तथा प्रतिभूति राशि की पुष्टि किए बिना कार्यादेश जारी करने जैसे मामलों पर भी सवाल उठाए गए। रिपोर्ट में DFO काविया बी., सहायक लेखाधिकारी मदन लाल सैनी और तत्कालीन भंडार प्रभारी प्रहलाद सिंह की भूमिका का उल्लेख करते हुए जिम्मेदारी निर्धारित करने की आवश्यकता बताई गई थी। मुख्य वन संरक्षक ने DFO और लेखाधिकारी को निलंबित अथवा APO करने तथा कथित गबन की ACB जांच कराने की अनुशंसा की थी।

ACB जांच का निर्णय, फिर सामने आया 3.37 लाख रुपये का डिमांड ड्राफ्ट

मामले में बाद में सामने आए वन विभाग के पत्र के अनुसार मुख्य वन संरक्षक की 2 सितंबर और जांच समिति की 15 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के आधार पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं एवं राजकीय राशि के कथित गबन की जांच ACB से कराने का निर्णय लिया गया। इसी बीच 3.37 लाख रुपये के डिमांड ड्राफ्ट ने प्रकरण में नया सवाल खड़ा कर दिया। DFO काविया बी. के पत्र के अनुसार 21 अक्टूबर को प्राप्त डिमांड ड्राफ्ट किसी अन्य व्यक्ति द्वारा बनवाया गया था, जबकि संबंधित राशि के कथित गबन को लेकर प्रहलाद सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई थी। पत्र में राजस्थान उच्च न्यायालय के 13 अक्टूबर के आदेश का हवाला देते हुए राशि जमा करने अथवा लौटाने पर मार्गदर्शन मांगा गया। सवाल यह है कि जब सरकारी राशि की प्राप्ति और उसके लेखांकन पर विवाद है, तो संबंधित रसीदों, बैंक रिकॉर्ड और राजकोषीय अभिलेखों का अंतिम मिलान कब होगा?

अब छापोली में आठ मजदूरों की मौत, वन भूमि पर सड़क बनाने की अनुमति किसने दी?

वित्तीय अनियमितताओं का मामला अभी जांच के दायरे में ही है कि झुंझुनूं जिले के छापोली गांव में 2 नवंबर को सड़क निर्माण के दौरान हुए हादसे ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए। उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार मिक्सचर मशीन का हाइड्रोलिक जैक हाईवोल्टेज बिजली लाइन के संपर्क में आने से आठ मजदूरों की मौत हो गई, जबकि पांच अन्य घायल हो गए। बताया गया कि सड़क वन विभाग की संरक्षित भूमि पर बनाई जा रही थी। DFO काविया बी. ने भी निर्माण के लिए वन विभाग की ओर से अनुमति नहीं दिए जाने की बात कही है। यदि निर्माण वास्तव में बिना आवश्यक स्वीकृति चल रहा था, तो प्रश्न उठता है कि इसकी जानकारी संबंधित अधिकारियों को कब मिली, निर्माण रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए और मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी थी?

चुनावी जल्दबाजी, राजनीतिक दबाव या ग्रामीणों की पहल? किसके कहने पर शुरू हुआ काम?

छापोली हादसे के बाद सड़क निर्माण की पृष्ठभूमि को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। मृतक के परिजनों ने पूर्व विधायक शुभकरण चौधरी के दबाव में निर्माण शुरू होने का आरोप लगाया, जबकि चौधरी ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि वन भूमि का मामला होने के कारण उन्होंने निर्माण में सहयोग करने से इनकार किया था। झुंझुनूं एसपी कवेंद्र सागर के अनुसार प्रारंभिक जानकारी में सड़क निर्माण ग्रामीणों के आपसी सहयोग से कराए जाने की बात सामने आई। दूसरी ओर निर्माण को पंचायत चुनाव से पहले पूरा कराने की जल्दबाजी और तीन अलग-अलग टीमों के एक साथ काम करने के दावे भी सामने आए हैं। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि निर्माण का निर्णय किसने लिया, मशीनें किसने लगवाईं, भुगतान कौन कर रहा था और हाईवोल्टेज लाइन के नीचे काम शुरू करने से पहले सुरक्षा व्यवस्था की जांच क्यों नहीं हुई? इन प्रश्नों के उत्तर बिना जांच के किसी राजनीतिक व्यक्ति, अधिकारी अथवा ग्रामीण समूह को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

एक ही वन मंडल में दो गंभीर मामले, क्या निगरानी व्यवस्था में कहीं बड़ी कमी है?

झुंझुनूं वन मंडल के दोनों मामलों की प्रकृति अलग है। वित्तीय प्रकरण में सरकारी राजस्व, रसीदों, निविदाओं और प्रशासनिक नियंत्रण की जांच जरूरी है, जबकि छापोली हादसे में निर्माण की वैधता, बिजली लाइन से सुरक्षा, ठेकेदारी व्यवस्था और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी निर्धारित करना आवश्यक है। लेकिन दोनों मामलों में एक समान प्रश्न उभरता है—नियमों का पालन सुनिश्चित करने वाली निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी? क्या वित्तीय प्रकरण में समय रहते अभिलेखों की जांच हुई? क्या वन भूमि पर सड़क निर्माण की जानकारी मिलने के बाद संबंधित अधिकारियों ने आवश्यक कार्रवाई की? क्या विभागीय स्तर पर सूचना, निरीक्षण और जवाबदेही की व्यवस्था में कोई कमी थी? इन सवालों का उत्तर जांच से ही मिल सकता है।

किसकी शह पर हो रहा था निर्माण? सवाल जरूरी है, लेकिन जवाब सबूतों से ही मिलेगा

संरक्षित वन भूमि पर बिना अनुमति निर्माण का आरोप अपने आप में गंभीर है। हालांकि किसी व्यक्ति की राजनीतिक शह, मिलीभगत अथवा जानबूझकर लापरवाही को तब तक स्थापित नहीं माना जा सकता, जब तक संबंधित आदेश, अनुमति पत्र, भुगतान रिकॉर्ड, निरीक्षण रिपोर्ट और जांच के निष्कर्ष सामने नहीं आते। यदि निर्माण बिना वैधानिक स्वीकृति हुआ है तो यह पता लगाना जरूरी है कि संबंधित भूमि की कानूनी स्थिति क्या थी, कौन-कौन सी अनुमतियां आवश्यक थीं और किस स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ। इसी तरह आठ मजदूरों की मौत के मामले में विद्युत सुरक्षा मानकों, मशीन संचालन और कार्यस्थल की सुरक्षा व्यवस्था की स्वतंत्र जांच भी जरूरी है।

आठ परिवारों का दर्द और लाखों के राजस्व का सवाल, जवाबदेही आखिर कब तय होगी?

छापोली हादसे में जान गंवाने वाले मजदूरों के परिवारों के लिए यह केवल एक प्रशासनिक मामला नहीं, बल्कि अपूरणीय क्षति है। वहीं वित्तीय अनियमितताओं के मामले में सार्वजनिक धन की सुरक्षा और सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता दांव पर है। दोनों प्रकरणों में आरोपों और तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए निष्पक्ष जांच आवश्यक है। वित्तीय मामले में ACB जांच की प्रगति और विभागीय कार्रवाई की स्थिति सामने आनी चाहिए, जबकि सड़क हादसे में निर्माण कराने वालों, संबंधित विभागों और सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की जांच होनी चाहिए।

नेचर टाइम्स का सबसे बड़ा सवाल है—जब एक ही वन मंडल में सरकारी राजस्व से लेकर संरक्षित वन भूमि पर निर्माण तक इतने गंभीर प्रश्न सामने आ रहे हैं, तो क्या राजस्थान वन विभाग इन दोनों मामलों में जिम्मेदारी निर्धारित कर पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित करेगा? आखिर नियमों की अनदेखी कहां हुई, किस स्तर पर हुई और उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी?

संपादकीय टिप्पणी: यह रिपोर्ट उपलब्ध विभागीय दस्तावेजों और छापोली हादसे से संबंधित समाचार विवरणों के विश्लेषण पर आधारित है। दोनों प्रकरणों के बीच किसी प्रत्यक्ष संबंध, मिलीभगत अथवा साझा षड्यंत्र का प्रमाण उपलब्ध नहीं है। ACB जांच शुरू होने की स्थिति, छापोली निर्माण की स्वीकृतियों और संबंधित अधिकारियों के अद्यतन पक्ष की स्वतंत्र पुष्टि अपेक्षित है।

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