Forest Chief की कुर्सी से पहले ‘जांच की कसौटी’: शिकायतों के बीच PCCF-HoFF चयन पर बड़े सवाल
अलवर, बारां और भीलवाड़ा से जुड़े मामलों का शिकायत में जिक्र; किसी दावेदार पर दोष सिद्ध नहीं, अब अगली चयन समिति बैठक पर नजर

सुमित जुनेजा | नेचर टाइम्स, जयपुर | 29 सितंबर 2026
राजस्थान वन विभाग के प्रशासनिक मुखिया Principal Chief Conservator of Forests एवं Head of Forest Force (PCCF-HoFF) के चयन की प्रक्रिया इस बार सामान्य पदोन्नति से कहीं बड़ा मामला बन गई है। 24 सितंबर को प्रस्तावित विशेष चयन समिति की बैठक कार्मिक विभाग ने एक दिन पहले “अपरिहार्य कारणों” से स्थगित कर दी। सरकार के आदेश में स्थगन को किसी शिकायत से नहीं जोड़ा गया है और नई तारीख अभी घोषित नहीं हुई है। मौजूदा PCCF-HoFF अरिजीत बनर्जी अक्टूबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं, इसलिए अब सवाल केवल अगला वन प्रमुख कौन होगा, इतना नहीं है; सवाल यह भी है कि चयन से पहले लंबित शिकायतों और जांचों का निस्तारण किस स्तर तक होगा। �
मामले ने इसलिए अधिक गंभीर रूप लिया क्योंकि कोटा के अधिवक्ता एवं पर्यावरण कार्यकर्ता तपेश्वर सिंह भाटी ने मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास को प्रतिवेदन देकर शीर्ष पद के एक दावेदार से जुड़े आरोपों की सक्षम प्राधिकारी से जांच होने तक उनके नाम पर विचार नहीं करने की मांग की है। रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवेदन में प्रधानमंत्री को 1 और 9 सितंबर को भेजी गई शिकायतों का भी उल्लेख है। आरोप यह है कि संबंधित अधिकारी के अतिरिक्त PCCF-HoFF प्रभार के दौरान अलवर और बारां से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांचों को विलंबित करने, दोबारा खोलने अथवा अनुचित तरीके से संभालने का मामला रहा। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन्हें किसी अधिकारी के दोषी पाए जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता। �
अलवर का मामला—₹17 करोड़ से लगभग ₹21 करोड़ तक पहुंचा सवाल
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अलवर वन मंडल से जुड़ी है। प्रकाशित रिपोर्ट में सात Village Forest Protection and Management Committees से जुड़े कार्यों में कथित अनियमितता की राशि पहले करीब ₹17 करोड़ और बाद में लगभग ₹21 करोड़ आंकी जाने का उल्लेख है। शिकायत में दावा है कि जांच में मामला भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को भेजने की अनुशंसा हुई थी, लेकिन रिपोर्ट सरकार तक कई महीने बाद पहुंची। �
इस विवाद का एक हिस्सा केवल शिकायत तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के 7 अप्रैल 2026 के आदेश में राजगढ़ रेंज, अलवर में 2023-24 के दौरान 650 हेक्टेयर में 11 पौधरोपण कार्यों से संबंधित शिकायत दर्ज है। आदेश में गलत साइट चयन, कम अथवा दोषपूर्ण कार्य, JCB से किए गए कार्य को श्रम दर पर दिखाने, माप पुस्तिका से जुड़े सवाल, कथित फर्जी दस्तावेज/हस्ताक्षर और भुगतान जैसे आरोप दर्ज किए गए हैं। NGT ने इन्हें अंतिम रूप से सिद्ध नहीं माना; उसने यह भी दर्ज किया कि प्रारंभिक जांच और कारण बताओ नोटिस की कार्रवाई हो चुकी थी तथा मामला सक्षम विभागीय प्राधिकारी के क्षेत्राधिकार में था। �
लेकिन NGT का अगला निर्देश महत्वपूर्ण है। अधिकरण ने पर्यावरण विभाग के सचिव को PCCF से जांच की प्रगति और सक्षम प्राधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई की रिपोर्ट लेने तथा उचित ऑडिट एवं जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा था। यानी वर्तमान PCCF-HoFF चयन विवाद से अलग, अलवर प्रकरण में जांच और ऑडिट की जवाबदेही पहले ही न्यायिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुकी है। �
बारां में ₹1,185 करोड़ नहीं, परियोजना का AFD हिस्सा ₹1,185.29 करोड़
दूसरा महत्वपूर्ण सिरा Rajasthan Forestry and Biodiversity Development Project (RFBDP) से जुड़ता है। शिकायत में आरोप है कि बारां से संबंधित एक पूर्व जांच को दोबारा खोला गया और बाद में फ्रांस की विकास एजेंसी AFD ने स्पष्टीकरण लंबित रहते NOC देने से इनकार किया तथा आरोपों को अपनी जांच इकाई के पास भेजा। यह शिकायत में दर्ज दावा है, कोई अंतिम दोष-निर्धारण नहीं। �
यहां आंकड़े को स्पष्ट रखना जरूरी है। राजस्थान वन विभाग की आधिकारिक जानकारी के अनुसार पूरी RFBDP परियोजना ₹1,693.91 करोड़ की है, जिसमें AFD का वित्तपोषण ₹1,185.29 करोड़ और राजस्थान सरकार का हिस्सा ₹508.62 करोड़ है। परियोजना 13 जिलों में लागू है और इसमें वन-पुनर्स्थापन, जैव विविधता संरक्षण, मृदा-जल संरक्षण, आजीविका, पर्यटन तथा क्षमता निर्माण जैसे घटक शामिल हैं। इसलिए ₹1,185 करोड़ को कथित अनियमितता की राशि कहना गलत होगा; यह AFD के वित्तपोषण का हिस्सा है। �
इसके साथ शिकायत में भीलवाड़ा के जूलीफ्लोरा प्रकरण की जांच का भी उल्लेख किया गया है। इस तरह शीर्ष पद के चयन के आसपास उठे सवाल किसी एक फाइल तक सीमित नहीं बताए जा रहे, बल्कि शिकायतकर्ता ने अलवर, बारां और भीलवाड़ा से जुड़े मामलों को “institutional integrity” के संदर्भ में चयन समिति के सामने रखने की मांग की है। �
तीन वरिष्ठ IFS चर्चा में, लेकिन फैसला चयन समिति का
प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार शीर्ष पद के लिए तीन वरिष्ठ IFS अधिकारियों के नाम चर्चा में हैं। आपके उपलब्ध दस्तावेज में पीके उपाध्याय, अनुराग भारद्वाज और शिखा मेहरा के नाम बताए गए हैं। हालांकि चर्चा में नाम होना चयन या प्राथमिकता का प्रमाण नहीं है; अंतिम प्रक्रिया निर्धारित सेवा नियमों और चयन समिति के निर्णय के अधीन है।
दस्तावेज के अनुसार विशेष चयन समिति में मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास, प्रमुख सचिव वन आनंद कुमार, मौजूदा PCCF-HoFF अरिजीत बनर्जी तथा केंद्र द्वारा नामित वरिष्ठ वन अधिकारी शामिल होने थे। ऐसे में स्थगित बैठक की नई तारीख और उस बैठक में शिकायतों/जांचों को किस रूप में लिया जाता है, दोनों पर वन विभाग की निगाह रहना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल—स्थगन का कारण क्या?
यहीं तथ्य और अटकल के बीच स्पष्ट रेखा जरूरी है। 24 सितंबर की बैठक शिकायत के कारण ही स्थगित हुई—यह अभी आधिकारिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं है। सरकारी आदेश ने बैठक टालने के लिए “अपरिहार्य कारण” बताया है। मीडिया रिपोर्ट में सूत्रों के आधार पर शिकायत को संभावित कारक बताया गया है, लेकिन सरकार ने दोनों घटनाओं के बीच कोई औपचारिक संबंध घोषित नहीं किया। �
मुख्य सचिव कार्यालय की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण है—उसने कहा है कि PCCF-HoFF चयन प्रक्रिया निर्धारित समयसीमा तथा स्थापित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार पूरी की जाएगी। �
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक बिंदु है। एक ओर राजस्थान वन विभाग को अगले मुखिया का चयन करना है; दूसरी ओर उसी प्रक्रिया के बीच शिकायतें, विभागीय जांच, NGT के रिकॉर्ड और करोड़ों रुपये के वन कार्यों से जुड़े आरोप सामने हैं। अभी किसी अधिकारी के खिलाफ दोष सिद्ध नहीं हुआ है, इसलिए आरोपों को निष्कर्ष की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। लेकिन चयन समिति की अगली बैठक से पहले यह प्रश्न जरूर बना रहेगा कि लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति क्या है, जांच कहां तक पहुंची, सक्षम अधिकारियों ने क्या निर्णय लिए और चयन प्रक्रिया में इन तथ्यों का कानूनी महत्व क्या होगा।



