राजस्थान वन विभागवनवन्यजीव
Trending

झुंझुनूं वन मंडल में लाखों की वित्तीय अनियमितताओं का मामला! CCF ने DFO के निलंबन की अनुशंसा की, कार्रवाई का क्या हुआ?

नीलामी पत्रावली गायब, सरकारी रसीदों पर संदिग्ध हस्ताक्षर और राजकोष में राशि जमा नहीं होने के आरोप; CCF की रिपोर्ट में DFO काविया बी. सहित संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल।

विशेष रिपोर्ट | नेचर टाइम्स
जयपुर/झुंझुनूं, 12 अक्टूबर 2026।

राजस्थान के झुंझुनूं वन मंडल में लकड़ी की नीलामी, सरकारी रसीदों और निविदा प्रक्रिया से जुड़ी गंभीर वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया है। मुख्य वन संरक्षक, जयपुर कार्यालय से 2 सितंबर 2026 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को भेजे गए पत्र में सरकारी राजस्व की प्राप्ति, रसीदों की प्रामाणिकता और निविदा प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पत्र में झुंझुनूं की उप वन संरक्षक काविया बी. सहित संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की जांच और प्रशासनिक कार्रवाई की अनुशंसा की गई है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुख्य वन संरक्षक ने अपनी रिपोर्ट में उप वन संरक्षक काविया बी. और सहायक लेखाधिकारी प्रथम मदन लाल सैनी को जांच पूरी होने तक तत्काल निलंबित करने अथवा पदस्थापन की प्रतीक्षा में रखने की अनुशंसा की थी। साथ ही सरकारी राशि के कथित गबन की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) से कराने को उचित बताया था।
हालांकि उपलब्ध दस्तावेजों में इन अनुशंसाओं पर उच्च स्तर से लिए गए अंतिम निर्णय का विवरण नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि रिपोर्ट भेजे जाने के बाद विभागीय स्तर पर क्या कार्रवाई हुई और जांच किस स्थिति में है?

14 लाख की अधिकतम बोली वाली नीलामी की पत्रावली गायब होने का उल्लेख

मुख्य वन संरक्षक कार्यालय के पत्र क्रमांक 151, दिनांक 2 सितंबर 2026 के अनुसार झुंझुनूं वन मंडल में जी.ए.-55 रसीद पुस्तक संख्या 0486760 तथा 30 जुलाई 2026 को संपन्न लकड़ी और कोयले की नीलामी से संबंधित पत्रावली कार्यालय में उपलब्ध नहीं पाई गई।


रिपोर्ट में नीलामी की अधिकतम बोली राशि 14 लाख रुपये बताई गई है। नीलामी से संबंधित मूल पत्रावली उपलब्ध नहीं होने से पूरी प्रक्रिया, प्राप्त राशि और संबंधित अभिलेखों के सत्यापन पर सवाल खड़े हुए हैं।
इस मामले में एक अन्य दस्तावेज भी महत्वपूर्ण है। उप वन संरक्षक काविया बी. के हस्ताक्षर से जारी 1 सितंबर 2026 के सर्च नोट में झुंझुनूं, चिड़ावा, खेतड़ी, उदयपुरवाटी और नवलगढ़ रेंजों से संबंधित लकड़ी एवं अन्य वन उपज की नीलामी पत्रावली उपलब्ध नहीं होने का उल्लेख किया गया है। इस नोट के माध्यम से संबंधित कर्मचारियों को पत्रावली उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए थे।

सरकारी रसीद पुस्तक के पन्ने गायब, 12 सितंबर को फिर जारी हुआ सर्च नोट

मामले में सरकारी रसीद पुस्तक संख्या 0486760 के कुछ पन्नों और काउंटरफॉइल के उपलब्ध नहीं होने का भी उल्लेख है।
मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट के अनुसार 24 अगस्त 2026 को मांगे जाने पर रसीद संख्या 036 की खाली काउंटरफॉइल तथा रसीद संख्या 037 से 041 और 045 की खाली प्रतियां कार्यालय भंडार प्रभारी प्रहलाद सिंह द्वारा उपलब्ध कराई गई थीं। लेकिन पुस्तक के शेष संबंधित अभिलेख और रसीद संख्या 036 की कार्यालय प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई।
इसके बाद 12 सितंबर 2026 को उप वन संरक्षक झुंझुनूं की ओर से एक और सर्च नोट जारी किया गया। इसमें रसीद संख्या 037, 038, 039, 040, 041 और 045 की दोनों प्रतियों तथा रसीद संख्या 036 की एक काउंटरफॉइल के अतिरिक्त रसीद पुस्तक की अन्य प्रतियां कार्यालय में उपलब्ध नहीं होने का उल्लेख किया गया।
इस प्रकार 2 सितंबर की रिपोर्ट और 12 सितंबर के सर्च नोट को साथ रखकर देखने पर स्पष्ट होता है कि सरकारी रसीद पुस्तक के अभिलेखों की उपलब्धता का प्रश्न बाद में भी बना हुआ था।
हालांकि इन दस्तावेजों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित रसीदें किस व्यक्ति के कब्जे में थीं अथवा उनके गायब होने के लिए कौन जिम्मेदार है। यह जांच का विषय है।

₹7,11,610 की चार रसीदों पर उठे गंभीर सवाल

मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट में सरकारी रसीद पुस्तक की चार रसीदों का विशेष उल्लेख किया गया है।
इनमें रसीद संख्या 001 पर 7,110 रुपये, रसीद संख्या 031 पर 11,250 रुपये, रसीद संख्या 036 पर 3,37,000 रुपये और रसीद संख्या 079 पर 3,56,250 रुपये की राशि दर्ज होने की बात कही गई है।
इन चारों रसीदों की कुल राशि 7 लाख 11 हजार 610 रुपये होती है।
रिपोर्ट के अनुसार इन रसीदों पर झुंझुनूं वन मंडल की मुहर और हस्ताक्षर अंकित हैं। मुख्य वन संरक्षक ने पत्र में उल्लेख किया है कि संबंधित हस्ताक्षर वन मंडल झुंझुनूं में पदस्थापित किसी भी सहायक वन संरक्षक के नहीं हैं। इसी आधार पर रिपोर्ट में हस्ताक्षरों को फर्जी तरीके से किए जाने और रसीदें जारी होने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि संबंधित राशि राजकोष में जमा नहीं कराई गई।
हालांकि हस्ताक्षरों की अंतिम प्रामाणिकता, रसीद जारी करने वाले व्यक्ति की पहचान तथा वास्तविक वित्तीय देनदारी का निर्धारण सक्षम जांच से ही हो सकेगा।

3.37 लाख और 5.33 लाख की रसीदें भी दस्तावेजों में

नेचर टाइम्स को उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में जी.ए.-55 रसीद पुस्तक संख्या 0486760 की रसीद संख्या 036 और 079 की प्रतियां भी शामिल हैं।
रसीद संख्या 036 पर 3,37,000 रुपये की राशि दर्ज है। वहीं रसीद संख्या 079 पर 5,33,500 रुपये अंकित दिखाई देते हैं।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट में रसीद संख्या 079 की राशि 3,56,250 रुपये लिखी गई है, जबकि उपलब्ध कराई गई रसीद की तस्वीर में 5,33,500 रुपये दर्ज हैं।
इस अंतर का स्पष्टीकरण आवश्यक है। क्या यह अलग प्रविष्टि, अभिलेखीय त्रुटि अथवा किसी अन्य कारण से उत्पन्न अंतर है, इसका निर्धारण मूल रसीद पुस्तक, काउंटरफॉइल, संबंधित नीलामी पत्रावली और राजकोषीय रिकॉर्ड के मिलान से ही संभव होगा।
इसलिए उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर कुल कथित गबन की अंतिम राशि निर्धारित करना फिलहाल उचित नहीं होगा।

निविदा प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी का भी उल्लेख

मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट केवल सरकारी रसीदों और नीलामी तक सीमित नहीं है। इसमें अगस्त 2026 के दौरान आमंत्रित विभिन्न निविदाओं की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार निविदा संख्या 13 से 17, 20 से 25, 28 तथा 30 से 33/2026-27 के संबंध में सफल निविदादाताओं को कार्यादेश जारी करने से पहले कार्य संपादन प्रतिभूति राशि और अतिरिक्त कार्य संपादन प्रतिभूति राशि जमा कराए जाने की प्रक्रिया में अनियमितताएं सामने आईं।
पत्र में कहा गया है कि नियमानुसार ई-ग्रास, बैंक ड्राफ्ट, राष्ट्रीय बचत पत्र, बैंक गारंटी, निर्धारित बीमा जमानत बॉन्ड, फिक्स्ड डिपॉजिट अथवा इलेक्ट्रॉनिक बैंक गारंटी जैसे माध्यमों से राशि जमा कराने के बजाय संबंधित राशि कार्यालय में प्रस्तुत करने के लिए लिखा गया।
रिपोर्ट में इस प्रक्रिया पर आपत्ति दर्ज करते हुए इसे उप वन संरक्षक की गलत मंशा का संकेत बताया गया है। यह रिपोर्ट में दर्ज आकलन है, न कि किसी न्यायिक अथवा अंतिम विभागीय जांच में स्थापित निष्कर्ष।
इसके अतिरिक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्यादेश जारी करने से पहले संबंधित राशि राजकोष में जमा होने की पुष्टि नहीं की गई। कुछ मामलों में प्रतिभूति राशि जमा हुए बिना भी कार्यादेश जारी होने का उल्लेख किया गया है।

उपापन समिति का गठन नहीं, नोटशीट पर भी नहीं हुई पूरी कार्रवाई

रिपोर्ट में राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता नियम, 2013 के नियम 3 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि झुंझुनूं वन मंडल कार्यालय में वर्ष 2026-27 के लिए उपापन समिति का गठन नहीं किया गया पाया गया।
साथ ही निविदा संबंधी संपूर्ण कार्रवाई निर्धारित नोटशीट पर दर्ज नहीं किए जाने का भी उल्लेख है।
मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट के अनुसार इन प्रक्रियागत कमियों के बावजूद निविदाओं से संबंधित कार्रवाई पूरी की गई।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी निविदाओं में निर्धारित प्रक्रिया का पालन सार्वजनिक धन के उपयोग, पारदर्शिता और जवाबदेही से सीधे जुड़ा होता है।

निलंबित भंडार प्रभारी की भूमिका भी जांच के दायरे में

मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट में कार्यालय के तत्कालीन भंडार प्रभारी प्रहलाद सिंह, कनिष्ठ सहायक की भूमिका का भी उल्लेख है।
रिपोर्ट के अनुसार सरकारी राशि के कथित गबन के संबंध में 26 अगस्त 2026 को झुंझुनूं कोतवाली थाने में एफआईआर संख्या 0207 दर्ज कराई गई थी।
पत्र में यह भी बताया गया है कि प्रहलाद सिंह की कर्तव्यनिष्ठा पूर्व से संदिग्ध रही थी और तत्कालीन उप वन संरक्षक द्वारा उन्हें आरोप पत्र जारी किए गए थे।
रिपोर्ट में इस बात पर भी सवाल उठाया गया है कि ऐसी स्थिति में उन्हें भंडार जैसी महत्वपूर्ण शाखा का प्रभार क्यों दिया गया।
दस्तावेजों के अनुसार 26 अगस्त 2026 के आदेश से प्रहलाद सिंह को निलंबित कर उनका मुख्यालय मुख्य वन संरक्षक कार्यालय, कोटा किया गया था।
हालांकि एफआईआर दर्ज होने और निलंबन की कार्रवाई को संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध आरोप सिद्ध होने के समान नहीं माना जा सकता।

DFO काविया बी. और मदन लाल सैनी के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा

मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट के अंतिम हिस्से में उप वन संरक्षक काविया बी., सहायक लेखाधिकारी प्रथम मदन लाल सैनी और तत्कालीन भंडार प्रभारी प्रहलाद सिंह की भूमिका का उल्लेख करते हुए जिम्मेदारी निर्धारित करने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में काविया बी. और मदन लाल सैनी को प्रथम दृष्टया दोषी बताया गया है।
इसके आधार पर मुख्य वन संरक्षक ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख से अनुशंसा की थी कि जांच पूरी होने तक काविया बी. और मदन लाल सैनी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए अथवा पदस्थापन की प्रतीक्षा में रखा जाए।
साथ ही सरकारी राशि के कथित गबन की जांच भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो से कराने की अनुशंसा भी की गई थी।
यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रथम दृष्टया दोषी बताए जाने और अंतिम जांच में दोष सिद्ध होने के बीच कानूनी अंतर है। रिपोर्ट में की गई अनुशंसा स्वयं में अंतिम दंडात्मक आदेश नहीं है।

रिपोर्ट के बाद भी सवाल बरकरार, कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं

झुंझुनूं वन मंडल से जुड़े इस मामले में उपलब्ध दस्तावेज कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करते हैं।
सरकारी नीलामी की मूल पत्रावली कहां है? रसीद पुस्तक के गायब पन्नों का क्या हुआ? विभिन्न रसीदों पर अंकित राशि और मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट में दर्ज रकम में अंतर क्यों है? संबंधित राशि वास्तव में किसने प्राप्त की और क्या उसका कोई हिस्सा राजकोष में जमा हुआ?
इसके अतिरिक्त निविदाओं में प्रतिभूति राशि जमा कराए बिना कार्यादेश जारी करने के संबंध में जिम्मेदारी किसकी थी और संबंधित अधिकारियों से क्या स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि 2 सितंबर 2026 को भेजी गई रिपोर्ट में निलंबन अथवा APO और ACB जांच की अनुशंसा के बाद विभाग ने क्या निर्णय लिया?

उपलब्ध दस्तावेजों में इन प्रश्नों का अंतिम उत्तर नहीं मिलता।

नेचर टाइम्स का सवाल: सरकारी राजस्व का पूरा हिसाब कब सामने आएगा?
झुंझुनूं वन मंडल का यह मामला केवल कुछ सरकारी रसीदों के गायब होने या निविदा प्रक्रिया में कथित लापरवाही तक सीमित नहीं है। दस्तावेजों में सरकारी राजस्व की प्राप्ति, उसके लेखांकन, मूल अभिलेखों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े गंभीर प्रश्न सामने आए हैं।
मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट में जिस स्तर की अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है, उनके संबंध में निष्पक्ष जांच और तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है।
नेचर टाइम्स का मानना है कि संबंधित रसीदों, नीलामी पत्रावलियों, राजकोषीय जमा रिकॉर्ड और निविदा अभिलेखों का मिलान कर जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाने चाहिए, ताकि सरकारी राजस्व की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके और किसी निर्दोष अधिकारी अथवा कर्मचारी पर अनावश्यक आरोप भी न लगे।
फिलहाल मुख्य वन संरक्षक की रिपोर्ट में दर्ज टिप्पणियां और अनुशंसाएं गंभीर हैं, लेकिन संबंधित अधिकारियों की अंतिम जिम्मेदारी सक्षम जांच और विधिसम्मत प्रक्रिया से ही निर्धारित होगी।

संपादकीय स्पष्टीकरण: यह समाचार उपलब्ध कराए गए सरकारी पत्रों, सर्च नोट और रसीदों की प्रतियों पर आधारित है। इनकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि तथा संबंधित अधिकारियों का विस्तृत पक्ष अभी प्राप्त नहीं हुआ है। समाचार में उल्लिखित आरोपों को अंतिम रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। उप वन संरक्षक काविया बी., संबंधित लेखा अधिकारियों तथा वन विभाग के उच्चाधिकारियों का अधिकृत स्पष्टीकरण प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
— नेचर टाइम्स | विशेष संवाददाता, जयपुर

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!