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पालीघाट में 100 घड़ियाल शावकों का जन्म, चंबल अभयारण्य में बड़ी सफलता

चंबल और पार्वती नदी संगम क्षेत्र में 22 से 25 नेस्ट में दिए गए थे 600 से अधिक अंडे, डीएफओ मानस सिंह के निर्देशन में वन विभाग ने बढ़ाई निगरानी, घड़ियाल संरक्षण को मिला बड़ा बल

नेचर टाइम्स | 23 मई 2026
विशेष रिपोर्ट : सुमित जुनेजा

राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा पर बहने वाली चंबल नदी एक बार फिर वन्यजीव संरक्षण की बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है। राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के पालीघाट क्षेत्र में इस वर्ष घड़ियाल संरक्षण को लेकर बेहद उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। चंबल और पार्वती नदी के संगम क्षेत्र में बड़ी संख्या में घड़ियालों ने नेस्ट तैयार कर अंडे दिए थे, जिनमें से अब लगभग 100 घड़ियाल हैचलिंग्स का सफलतापूर्वक बाहर निकलना दर्ज किया गया है। वन विभाग इसे चंबल क्षेत्र में वर्षों से चल रहे संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता मान रहा है।

फाइल फोटो

वन विभाग के अनुसार इस वर्ष अप्रैल माह के शुरुआती दिनों में घड़ियालों ने पालीघाट और आसपास के संवेदनशील रेतीले तटों पर लगभग 22 से 25 नेस्ट तैयार किए थे। इन नेस्ट में लगभग 600 से 650 अंडे दिए गए। विशेषज्ञों के अनुसार घड़ियाल के अंडों से बच्चों के बाहर निकलने की अवधि लगभग दो महीने की होती है और इसी क्रम में मई के अंतिम सप्ताह से हैचलिंग्स निकलने लगे हैं। अभी तक पालीघाट स्थित 4 नेस्ट से लगभग 100 नवजात घड़ियाल सुरक्षित बाहर आए हैं। वन विभाग का मानना है कि आने वाले दिनों में अन्य नेस्ट से भी बड़ी संख्या में हैचलिंग्स बाहर आ सकते हैं।

डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि घड़ियाल विश्व की सबसे संकटग्रस्त जलीय प्रजातियों में शामिल है और चंबल नदी आज देश में इनके सबसे सुरक्षित प्राकृतिक आवासों में से एक मानी जाती है। उन्होंने बताया कि वन विभाग द्वारा नेस्ट स्थलों की लगातार निगरानी की जा रही है तथा नवजात घड़ियालों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। विभागीय टीम द्वारा संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित गश्त, नदी तटों का निरीक्षण और चौबीस घंटे मॉनिटरिंग की जा रही है ताकि किसी भी प्रकार का खतरा उत्पन्न न हो सके।

वन विभाग ने घड़ियालों के नेस्ट वाले क्षेत्रों के आसपास तीन तरफ से विशेष फेंसिंग भी की है ताकि जंगली जानवर अंडों या नवजात बच्चों को नुकसान न पहुंचा सकें। कई स्थानों पर मानव गतिविधियों को सीमित किया गया है तथा पर्यटकों और स्थानीय लोगों से संवेदनशील क्षेत्रों से दूरी बनाए रखने की अपील की गई है। विभाग का कहना है कि घड़ियाल अत्यंत संवेदनशील प्रजाति है और नेस्टिंग अवधि के दौरान मानवीय हस्तक्षेप उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकता है।

फाइल फोटो

डीएफओ मानस सिंह ने बताया कि चंबल नदी का यह क्षेत्र केवल घड़ियालों का ही नहीं बल्कि मगरमच्छ, कछुए, ऊदबिलाव, गंगा डॉल्फिन और कई दुर्लभ पक्षियों का भी महत्वपूर्ण सुरक्षित आवास है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य देश और दुनिया में जैव विविधता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां की स्वच्छ जलधारा और रेतीले तट घड़ियालों के प्रजनन के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार घड़ियाल संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं बल्कि पूरी नदी पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। घड़ियाल नदी के खाद्य तंत्र का अहम हिस्सा हैं और इनकी उपस्थिति नदी के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत मानी जाती है। लेकिन अवैध मछली पकड़ना, नदी प्रदूषण, रेत खनन, जल प्रवाह में कमी और मानवीय दबाव जैसी चुनौतियां आज भी घड़ियालों के अस्तित्व पर खतरा बनी हुई हैं।

पालीघाट क्षेत्र में इस बार बड़ी संख्या में अंडों से बच्चों का सुरक्षित निकलना वन विभाग के लिए राहत और उत्साह दोनों लेकर आया है। वन विभाग की टीम अब इन नवजात घड़ियालों की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए है। अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती कुछ सप्ताह हैचलिंग्स के लिए बेहद संवेदनशील होते हैं और इस दौरान सुरक्षा में किसी प्रकार की लापरवाही गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

स्थानीय ग्रामीणों ने भी वन विभाग के संरक्षण प्रयासों की सराहना की है। ग्रामीणों का कहना है कि चंबल नदी और यहां का वन्यजीव जीवन क्षेत्र की पहचान है और इसे सुरक्षित रखना सभी की जिम्मेदारी है। वन विभाग ने आमजन से अपील की है कि नदी तटों के आसपास अनावश्यक आवाजाही न करें, प्लास्टिक और कचरा नदी में न फेंकें तथा वन्यजीवों के प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित करने वाली गतिविधियों से बचें।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसी प्रकार संरक्षण प्रयास लगातार जारी रहे तो आने वाले वर्षों में चंबल क्षेत्र देश में घड़ियाल संरक्षण का सबसे मजबूत मॉडल बन सकता है। पालीघाट में घड़ियाल हैचलिंग्स का सफलतापूर्वक बाहर आना केवल वन विभाग की उपलब्धि नहीं बल्कि पूरे चंबल क्षेत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, जो यह साबित करता है कि यदि वैज्ञानिक संरक्षण, स्थानीय सहयोग और सतत निगरानी साथ-साथ चले तो संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाया जा सकता है।

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