राजस्थान वन्यजीव गणना: आंधी-बारिश में भी जारी मिशन
31 वाटरहोल पर 62 की टीम तैनात, 18 महिलाओं की भागीदारी—आंधी, बारिश और 40° तापमान में भी जारी वन्यजीव एस्टिमेशन, रावत परिवार ने संभाली भोजन व्यवस्था

जयपुर/झालाना | Nature Times विशेष रिपोर्ट
देश के कई हिस्सों में पड़ रही भीषण गर्मी और हीटवेव की स्थिति के बीच राजस्थान से एक ऐसी पहल सामने आई है, जिसने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक नई सोच और दिशा का संकेत दिया है। तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए राजस्थान वन विभाग ने वन्यजीव गणना (Wildlife Estimation) के समय में बदलाव कर एक व्यावहारिक और दूरदर्शी निर्णय लिया है। पहले यह गणना 1 मई सुबह 8 बजे से 2 मई सुबह 8 बजे तक प्रस्तावित थी, लेकिन बढ़ती गर्मी और संभावित जोखिम को देखते हुए इसे संशोधित कर 1 मई शाम 5 बजे से 2 मई शाम 5 बजे तक कर दिया गया, जिससे वनकर्मियों और वन्यजीवों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
फाइल फोटो
जयपुर प्रादेशिक रेंज के अंतर्गत आने वाले झालाना लेपर्ड सफारी और उससे जुड़े क्षेत्रों में इस बार वन्यजीव एस्टिमेशन को बड़े और व्यवस्थित स्तर पर संचालित किया जा रहा है। पूरे अभियान के तहत 31 वाटरहोल पॉइंट्स पर 31 मचान स्थापित किए गए हैं, जहां हर मचान पर एक वनकर्मी और एक स्वयंसेवक तैनात है। इस प्रकार कुल 62 लोगों की टीम 24 घंटे तक लगातार इन जलस्रोतों पर बैठकर वन्यजीवों की गतिविधियों का बारीकी से अवलोकन कर रही है, जिससे सटीक और विश्वसनीय आंकड़े प्राप्त किए जा सकें।
इन वाटरहोल्स का वितरण भी रणनीतिक रूप से किया गया है, जिसमें 17 झालाना लेपर्ड सफारी क्षेत्र में, 11 आमागढ़ लेपर्ड सफारी में और 1-1 वाटरहोल झोटवाड़ा, गोनर और मुहाना क्षेत्रों में शामिल हैं। इस बार गणना के लिए पारंपरिक वाटरहोल ऑब्जर्वेशन के साथ-साथ आधुनिक कैमरा ट्रैप तकनीक का भी सहारा लिया जा रहा है, जिससे वन्यजीवों की उपस्थिति, उनकी गतिविधियों और संख्या का वैज्ञानिक तरीके से आंकलन किया जा सके। इसी दौरान झालाना के नीम गट्टा (रूट नंबर-1) वाटर पॉइंट से एक रोमांचक और महत्वपूर्ण वन्यजीव मूवमेंट भी सामने आई, जहां मचान पर तैनात वनकर्मियों और स्वयंसेवकों ने बीती रात दो लेपर्ड—एक नथवाली (मादा) और दूसरा बहादुर (नर)—को एक साथ देखा। दोनों लेपर्ड की यह ‘मेटिंग’ न केवल क्षेत्र में उनकी सक्रिय उपस्थिति का संकेत है, बल्कि उनके व्यवहारिक पैटर्न और क्षेत्रीय गतिविधियों को समझने के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही है।
फाइल फोटो
इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी खासियत महिलाओं की बढ़ती और प्रभावशाली भागीदारी रही है। कुल 62 प्रतिभागियों में से 18 महिलाएं इस बार सक्रिय रूप से इस गणना का हिस्सा बनी हैं, जिनमें कई ऐसी महिला वनकर्मी और वॉलिंटियर्स शामिल हैं जिन्होंने पहली बार इस प्रकार के चुनौतीपूर्ण कार्य में भाग लिया है। पहली बार होने के बावजूद उनके भीतर का उत्साह, अनुशासन और धैर्य इस अभियान को एक नई ऊर्जा प्रदान करता नजर आया।
जयपुर प्रादेशिक रेंज के रेंजर जितेंद्र सिंह शेखावत के अनुसार, इस बार महिलाओं की भागीदारी अभूतपूर्व रही है और यह राज्य सरकार की उस मंशा को स्पष्ट रूप से दर्शाती है जिसमें हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और जनसहभागिता को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि महिला स्टाफ और वॉलिंटियर्स ने जिस समर्पण और जिम्मेदारी के साथ कार्य किया है, वह भविष्य में ऐसे अभियानों के लिए प्रेरणा का कार्य करेगा।
भीषण गर्मी और 40 डिग्री से अधिक तापमान के बीच इस अभियान को सफलतापूर्वक संचालित करने के लिए वन विभाग ने विशेष व्यवस्थाएं भी की हैं। आज 2 मई को सुबह तेज आंधी और बारिश के बावजूद भी मचान पर तैनात वॉलिंटियर्स और वनकर्मी डटे रहे और विपरीत परिस्थितियों में भी वन्यजीव गणना का कार्य निरंतर जारी रखा। सभी मचान स्थलों पर पर्याप्त पेयजल, छाया और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं, ताकि कोई भी सदस्य डिहाइड्रेशन या स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सामना न करे। इसके साथ ही, क्विक रिस्पॉन्स टीम (QRT) को पूरी तरह अलर्ट मोड पर रखा गया है, जो लगातार मॉनिटरिंग कर रही है और किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सहायता के लिए तैयार है।
इस अभियान की एक और महत्वपूर्ण और सराहनीय कड़ी सामाजिक सहयोग के रूप में सामने आई है। जयपुर के प्रतिष्ठित रावत परिवार ने इस कठिन कार्य में जुटे वनकर्मियों और वॉलिंटियर्स के लिए भोजन की उत्कृष्ट व्यवस्था कर एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। रात के भोजन से लेकर अगले दिन दोपहर के भोजन तक, मचान पर तैनात सभी प्रतिभागियों के लिए संतुलित और समय पर भोजन की व्यवस्था की गई, जिससे उनका मनोबल ऊंचा बना रहा और वे पूरी एकाग्रता के साथ अपने कार्य में लगे रह सके।
वन विभाग और समाज के इस समन्वय ने यह साबित कर दिया है कि वन्यजीव संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जनभागीदारी की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जब प्रशासनिक दक्षता, वैज्ञानिक तकनीक और सामाजिक सहयोग एक साथ मिलते हैं, तब किसी भी संरक्षण अभियान को नई ऊंचाई दी जा सकती है।
झालाना में चल रहा यह वन्यजीव एस्टिमेशन अभियान अब केवल एक गणना प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर पर एक मॉडल के रूप में उभर रहा है, जहां महिला सशक्तिकरण, तकनीकी नवाचार और जनसहभागिता का संतुलित समावेश देखने को मिल रहा है। राजस्थान का यह प्रयास यह स्पष्ट करता है कि यदि इसी तरह की रणनीति और सहयोग देश के अन्य हिस्सों में भी अपनाया जाए, तो भारत में वन्यजीव संरक्षण को एक नई दिशा और गति मिल सकती है।
राजस्थान के जंगलों में चल रहे इस व्यापक वन्यजीव गणना अभियान के बीच झालाना का यह संगठित और नवाचारपूर्ण प्रयास एक मजबूत संदेश देता है—कि चुनौतियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि रणनीति सटीक हो और सहभागिता मजबूत हो, तो हर लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
