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कागजी संरक्षण का सच: Sariska Tiger Reserve में बढ़ते बाघ, अधूरी तैयारी

करोड़ों खर्च, अधूरी योजनाएं और कैरिंग कैपेसिटी पर पहुंचे बाघ

सुमित जुनेजा

नेचर टाइम्स, अलवर।

राजस्थान का सरिस्का टाइगर रिजर्व देश के उन महत्वपूर्ण टाइगर लैंडस्केप में शामिल है, जिनकी उपयोगिता केवल राज्य तक सीमित नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अहम मानी जाती है। दिल्ली-एनसीआर से इसकी नजदीकी इसे देश का सबसे सुलभ वन्यजीव गंतव्य बना सकती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सरिस्का आज भी अव्यवस्थाओं, अधूरी योजनाओं और प्रबंधन की धीमी गति के बीच फंसा हुआ है। करोड़ों रुपये के बजट और सख्त न्यायिक निगरानी के बावजूद यहां संरक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

राज्य में संचालित पांच टाइगर रिजर्व रणथंभौर, सरिस्का, मुकुंदरा हिल्स, रामगढ़ विषधारी और धौलपुर-करौली में सरिस्का की भूमिका रणनीतिक रूप से बेहद अहम है। वर्ष 2025 के लिए इसकी वार्षिक कार्ययोजना में 747.74 लाख रुपये स्वीकृत किए गए थे, जिनका उद्देश्य एंटी-पोचिंग सिस्टम को मजबूत करना और बाघों के आवास को सुरक्षित बनाना था। इसके बावजूद 528 लाख रुपये के एंटी-पोचिंग कार्य 31 मार्च 2026 तक भी कई स्थानों पर अधूरे हैं। ऐसे में जंगल की निगरानी और बाघों की सुरक्षा कितनी प्रभावी है, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।

क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट  से गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया भी वर्षों से अधूरी है। 11 गांवों में से केवल 5 का ही पूर्ण विस्थापन हो पाया है, जबकि 6 गांव अब भी प्रक्रिया में हैं। प्रति परिवार 15 लाख रुपये के पैकेज और 24 जुलाई 2025 को किए गए संशोधन के बावजूद प्रगति सुस्त है। इतना ही नहीं, कुछ विस्थापित परिवारों के दोबारा जंगल क्षेत्र में लौटने की खबरें भी सामने आती रही हैं, जो पूरी पुनर्वास नीति की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करती हैं।

इधर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही सीटीएच रैशनलाइजेशन प्रक्रिया भी तय समयसीमा के बावजूद अधर में है। 17 अप्रैल 2023 से शुरू हुए घटनाक्रम के बाद 11 दिसंबर 2024 को कोर्ट ने सेंट्रल एंपावर्ड कमेटी की 25 सिफारिशों को लागू करने के लिए एक साल का समय दिया था, लेकिन अब तक अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। ड्राफ्ट में सीटीएच क्षेत्र 881.11 वर्ग किमी से बढ़ाकर 924.49 वर्ग किमी करने और बफर क्षेत्र घटाने का प्रस्ताव रखा गया, जिसे लेकर पर्यावरणविदों ने आपत्ति जताई है। आरोप है कि इससे बंद खदानों के दोबारा खुलने की संभावना बढ़ सकती है।

इस बीच सरिस्का में बाघों की संख्या 52 तक पहुंच चुकी है, जो इसकी फुल कैरिंग कैपेसिटी के बराबर मानी जा रही है। युवा बाघ टेरेटरी की तलाश में सरिस्का से बाहर तक भटकते नजर आ रहे हैं कुछ जयपुर की ओर नरायणी माता रोड तक देखे गए हैं, जबकि एसटी-24 पिछले दो वर्षों से जमवारामगढ़ क्षेत्र में डेरा डाले हुए है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरिस्का एक आइसोलेटेड टाइगर रिजर्व है, जिसका अन्य रिजर्व से कोई प्रभावी कॉरिडोर कनेक्शन नहीं है। ऐसे में बाघों की बढ़ती संख्या भविष्य में आपसी संघर्ष और मानव-वन्यजीव टकराव को बढ़ा सकती है।  इसके बावजूद जमवारामगढ़ को सरिस्का फेज-2 के रूप में विकसित करने या इंटर-स्टेट ट्रांसलोकेशन जैसे उपाय अब तक लागू नहीं हो पाए हैं। रामगढ़ विषधारी में ट्रांसलोकेशन का प्रयोग हो चुका है, लेकिन सरिस्का में यह पहल अभी भी कागजों तक सीमित है।

कोर क्षेत्र में स्थित पांडुपोल हनुमान मंदिर को लेकर भी नई बहस खड़ी हो गई है। मंदिर तक पहुंच मार्ग को मजबूत करने और इलेक्ट्रिक व्हीकल आधारित परिवहन शुरू करने की योजना के तहत 29 जनवरी 2026 को टेंडर प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिसकी समयसीमा 31 मार्च 2026 तय की गई है। करीब 7 करोड़ रुपये की इस परियोजना को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करेगी। पहले डामर सड़क का प्रस्ताव था, जिसे सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के चलते रोकना पड़ा और अब डब्लूबीएम तकनीक से सड़क सुधार का विकल्प अपनाया जा रहा है। वहीं श्रद्धालुओं के लिए ई-बस सेवा की घोषणा भी अब तक धरातल पर नहीं उतर पाई है।

पर्यटन प्रबंधन की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। कोर क्षेत्र में मोबाइल प्रतिबंध के बावजूद पर्यटक खुलेआम वीडियो बनाते देखे जाते हैं। प्लास्टिक कचरा जंगल में पहुंच रहा है और कई स्थानों पर लोग वन्यजीवों को खाना खिलाते नजर आते हैं, जो उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित करता है। नियम मौजूद हैं, लेकिन उनका पालन कमजोर है। सफारी प्रबंधन में भी संभावनाओं का पूरा उपयोग नहीं हो रहा है। सीमित रूट ही पर्यटकों के लिए खुले हैं, जबकि कई ऐसे क्षेत्र जहां बाघों की गतिविधि अधिक है, अब तक बंद पड़े हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक प्रबंधन के साथ नए रूट खोले जाएं तो पर्यटन और संरक्षण दोनों को संतुलित किया जा सकता है।

जंगल के भीतर मानवीय दबाव भी लगातार बना हुआ है। करीब 29 गांव अब भी कोर और सीटीएच क्षेत्र में मौजूद हैं, जहां मवेशियों की चराई और लोगों की आवाजाही आम है। इससे न केवल बाघों के आवास पर दबाव बढ़ता है, बल्कि किसी बड़ी अनहोनी का खतरा भी बना रहता है।  हालांकि वन विभाग चौकियों के सुदृढ़ीकरण और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर काम कर रहा है—37 चौकियों के सुधार, 9 नई एंटी-पोचिंग चौकियों के निर्माण और सोलर सिस्टम जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा रही हैं—लेकिन इन योजनाओं का प्रभाव पूरी तरह जमीन पर कब दिखाई देगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

इसी के साथ सरिस्का में बाघों की ‘मछली’ वंशावली का प्रभाव भी सामने आ रहा है, जिससे अनुवांशिक बीमारियों का खतरा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते इंटर-स्टेट ट्रांसलोकेशन जैसे कदम नहीं उठाए गए तो यह जोखिम और बढ़ सकता है। कुल मिलाकर सरिस्का आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां एक तरफ बढ़ती बाघ संख्या सफलता की कहानी कहती है, तो दूसरी ओर अधूरी योजनाएं, धीमा क्रियान्वयन और बढ़ता मानवीय दबाव इसकी कमजोरियों को उजागर करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरिस्का की योजनाएं कागजों से निकलकर जमीन पर उतरेंगी, या यह टाइगर रिजर्व केवल ‘संभावनाओं का प्रतीक’ बनकर रह जाएगा।

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