राजस्थान के 8 नए वन मंडल: DCF तैनात, स्टाफ-संसाधन और अधिकार हस्तांतरण अधूरा
राजपत्र में रेंज और कार्यक्षेत्र तय, DCF भी तैनात; लेकिन मंत्रालयिक स्टाफ, कार्यालय भवन, संसाधन और अधिकार-रिकॉर्ड हस्तांतरण की अधूरी प्रक्रिया ने खड़े किए गंभीर सवाल

सुमित जुनेजा | नेचर टाइम्स | जयपुर | 5 अक्टूबर 2026
राजस्थान में नए जिलों के अनुरूप वन प्रशासन को मजबूत करने के लिए बनाए गए आठ नए वन मंडलों की व्यवस्था महीनों बाद भी पूरी तरह पटरी पर नहीं आ सकी है। मुख्यमंत्री की बजट घोषणा के बाद बालोतरा, सलूम्बर, ब्यावर, फलोदी, डीडवाना-कुचामन, डीग, कोटपूतली-बहरोड़ और खैरथल-तिजारा में उप वन संरक्षक कार्यालय स्थापित करने की प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ी, कार्यालयाध्यक्ष घोषित हुए, Office ID और DDO Code जारी हुए, DCF पदस्थापित किए गए और राजपत्र में रेंज व कार्यक्षेत्र तक निर्धारित कर दिए गए। इसके बावजूद नए कार्यालयों में मंत्रालयिक एवं लेखा स्टाफ, भवन, संसाधन और पुराने कार्यालयों से वास्तविक प्रशासनिक हस्तांतरण की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल बने हुए हैं।

मामले की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह केवल नई पोस्टिंग का मामला नहीं है। राजस्थान राजपत्र में 14 अगस्त 2026 को प्रकाशित वन विभाग की 30 जुलाई की अधिसूचना ने नए वन मंडलों के क्षेत्राधिकार की तस्वीर भी साफ कर दी। अधिसूचना में बताया गया कि 5 अगस्त 2023 को गठित 17 नए जिलों में से बाद में 9 जिलों को निरस्त किए जाने के बाद शेष 8 नए जिलों के लिए वन मंडलों का पुनर्गठन किया गया। संबंधित रेंज कार्यालय, तहसील और वन क्षेत्रफल तक निर्धारित कर दिए गए तथा यह भी स्पष्ट किया गया कि रेंजों का वनखंडवार विस्तृत विवरण अलग से जारी किया जाएगा।
कागज पर पूरी व्यवस्था, मैदान में अधूरा अमल
इन कार्यालयों को लेकर प्रशासनिक तैयारी काफी पहले शुरू हो चुकी थी। मुख्यमंत्री की वर्ष 2025-26 की बजट घोषणा संख्या 96 में नवस्थापित आठ जिलों में सभी विभागों के जिला स्तरीय कार्यालयों की स्थापना और आवश्यक आधारभूत संरचना के निर्माण के लिए एक हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किए जाने का उल्लेख वन विभाग के आदेश में है।
इसके बाद प्रशासनिक एवं वित्त विभाग की सहमति के आधार पर आठ नए उप वन संरक्षक कार्यालयों को कार्यालयाध्यक्ष घोषित किया गया। विभाग की वेबसाइट पर भी 4 मई 2026 को नए कार्यालयों के Office IDs/DDO Codes जारी किए जाने संबंधी आदेश दर्ज है।
फिर 10 जुलाई 2026 को राजस्थान वन सेवा के अधिकारियों के व्यापक पदस्थापन/स्थानांतरण आदेश जारी हुए। उपलब्ध आदेश में नरेंद्र सिंह शेखावत को जोधपुर से उप वन संरक्षक फलोदी, शुभम जैन को वन्यजीव माउंट आबू से उप वन संरक्षक डीडवाना-कुचामन, सुरेश मिश्रा को सतर्कता शाखा से उप वन संरक्षक डीग जैसे पदस्थापन स्पष्ट रूप से दर्ज हैं। उसी दिन विभाग में मंत्रालयिक तथा अधीनस्थ संवर्ग के भी बड़े पैमाने पर स्थानांतरण आदेश जारी हुए थे।
यानी कार्यालय बने, DDO Code मिला, DCF मिले और क्षेत्राधिकार भी राजपत्र में तय हो गया—लेकिन सवाल अब व्यवस्था को वास्तव में चलाने का है।
DCF हैं, लेकिन पूरी टीम कहां?
नए वन मंडलों को लेकर सामने आ रही सबसे बड़ी समस्या मंत्रालयिक एवं लेखा कर्मचारियों की पर्याप्त तैनाती की है। DCF कार्यालय केवल अधिकारी के पदस्थापन से नहीं चलता। स्थापना, लेखा, बजट, भुगतान, बिल, रिकॉर्ड, पत्राचार और प्रशासनिक कार्यों के लिए संबंधित स्टाफ आवश्यक होता है।
विभागीय स्तर पर यह स्थिति सामने आ रही है कि नए कार्यालयों में अधिकारी तथा सीमित कर्मचारी तो लगा दिए गए, लेकिन कार्यालय को पूर्ण क्षमता से चलाने के लिए जरूरी स्टाफ और व्यवस्थाएं अभी भी अधूरी हैं। कुछ स्थानों पर नए कार्यालयों के लिए स्थानांतरित कार्मिकों के सामने भी कार्य और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होने की बात कही जा रही है।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वन विभाग के अपने प्रशासनिक ढांचे में ministerial और supporting staff को विभागीय मानव संसाधन का हिस्सा माना गया है।
डीडवाना-कुचामन: DCF दर्ज, लेकिन विभागीय डायरेक्टरी में पता खाली
डीडवाना-कुचामन की स्थिति इस पूरी व्यवस्था का एक दिलचस्प उदाहरण है। वन विभाग की वर्तमान जिला-वार टेलीफोन डायरेक्टरी में DCF Didwana-Kuchaman के रूप में शुभम जैन का नाम, मोबाइल नंबर और सरकारी ई-मेल दर्ज है, लेकिन उसी प्रविष्टि में कार्यालय का पता दर्ज नहीं दिखाई देता।
ऐसे में सवाल स्वाभाविक है—जिस वन मंडल के लिए अधिकारी, सरकारी ई-मेल और प्रशासनिक पहचान मौजूद है, उसके नियमित कार्यालय संचालन के लिए स्थायी भवन, पूरा स्टाफ और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था कब तक पूरी होगी?
राजपत्र ने जंगल बांट दिए, अब प्रशासनिक नियंत्रण का इंतजार?
14 अगस्त के राजपत्र में कई नए मंडलों की रेंज और क्षेत्रफल बेहद स्पष्ट तरीके से दर्ज किए गए हैं। बालोतरा वन मंडल के अंतर्गत धोरीमन्ना, बालोतरा, सिणधरी, सिवाना और कल्याणपुर सहित कुल 35,903.1578 हेक्टेयर क्षेत्र दिखाया गया है। कोटपूतली-बहरोड़ में विराटनगर, कोटपूतली, पावटा, बानसूर और बहरोड़ रेंज का कुल 36,991.4500 हेक्टेयर, जबकि खैरथल-तिजारा में किशनगढ़ बास, खैरथल, मुंडावर, तिजारा और टपूकड़ा का कुल 20,909.4210 हेक्टेयर क्षेत्र निर्धारित किया गया है।
इसी तरह पुनर्गठन के बाद दूसरे मंडलों के अंतर्गत भी संबंधित रेंज और तहसीली क्षेत्र तय किए गए हैं। इसका अर्थ है कि भौगोलिक क्षेत्राधिकार को लेकर सरकार का औपचारिक ढांचा सामने आ चुका है।
इसके बावजूद जमीनी प्रशासन में पुराने और नए वन मंडलों के बीच रिकॉर्ड, बिल, वित्तीय कामकाज, स्टाफ तथा वास्तविक नियंत्रण के हस्तांतरण को लेकर अड़चनें बताई जा रही हैं। आरोप है कि कुछ पुराने कार्यालयों से अधिकार और कार्य पूरी तरह नए कार्यालयों को नहीं सौंपे जाने से नए DCF अपनी जिम्मेदारी के अनुरूप स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पा रहे हैं। इस दावे की संबंधित CCF और पुराने DCF स्तर पर पुष्टि आवश्यक है।
17 अगस्त के निर्देश भी सवालों के घेरे में
मामले में PCCF Development के 17 अगस्त 2026 के निर्देशों की अनुपालना को लेकर भी विभागीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि नए कार्यालयों को प्रभावी बनाने के लिए दिए गए निर्देशों पर कुछ संबंधित मुख्य वन संरक्षक स्तर से अपेक्षित गति से कार्रवाई नहीं हुई।
यदि ऐसा है तो मामला महज प्रशासनिक देरी का नहीं रह जाता। क्योंकि एक ओर राजपत्र नए वन मंडल का क्षेत्र तय करता है और दूसरी ओर उसी क्षेत्र के प्रशासन, रिकॉर्ड, स्टाफ तथा वित्तीय नियंत्रण का व्यावहारिक हस्तांतरण लंबित रहता है, तो इसका सीधा असर फील्ड स्तर पर पड़ना स्वाभाविक है।
जंगल की सुरक्षा से लेकर विकास कार्य तक असर
वन मंडल किसी जिले में केवल एक प्रशासनिक कार्यालय नहीं होता। इसके माध्यम से वन सुरक्षा, अवैध कटाई एवं अतिक्रमण पर निगरानी, वन अपराधों पर कार्रवाई, पौधरोपण, वन विकास कार्य, बजट व्यय, भुगतान, फील्ड स्टाफ का नियंत्रण और विभिन्न योजनाओं का क्रियान्वयन होता है।
ऐसे में नए DCF के पास क्षेत्र तो हो लेकिन पर्याप्त कर्मचारी और संसाधन न हों, या संबंधित रिकॉर्ड और वित्तीय अधिकारों का हस्तांतरण अधूरा रहे, तो नई व्यवस्था का उद्देश्य ही प्रभावित हो सकता है। सीमित स्टाफ के कारण फील्ड मॉनिटरिंग और कार्यालयी काम दोनों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
आदेशों की लंबी श्रृंखला, फिर अड़चन कहां?
पूरे घटनाक्रम की समयरेखा ही सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है—बजट घोषणा में व्यवस्था का प्रावधान हुआ; अप्रैल में नए कार्यालयों से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ी; मई में Office ID/DDO Code जारी हुए; 10 जुलाई को अधिकारियों की पोस्टिंग हुई; 30 जुलाई की अधिसूचना 14 अगस्त के राजपत्र में प्रकाशित होकर क्षेत्र और रेंज तय कर गई। इसके बाद भी यदि अक्टूबर तक कार्यालय स्टाफ, संसाधन और अधिकारों के पूर्ण हस्तांतरण का इंतजार कर रहे हैं, तो देरी आखिर किस स्तर पर है?
वन मुख्यालय के सामने अब चुनौती आठ नए DCF के नाम बोर्ड पर लिखने की नहीं, बल्कि इन आठ वन मंडलों को वास्तव में काम करने लायक प्रशासनिक इकाई बनाने की है।
DCF मिल गए, DDO Code मिल गया, रेंज और जंगल भी तय हो गए—अब सवाल है: स्टाफ, संसाधन और पूरा अधिकार कब मिलेगा?




