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सरिस्का टाइगर रिजर्व में हुआ दुर्लभ गिद्धों का विस्तृत सर्वेक्षण, संरक्षण में मिलेगा बड़ा योगदान

राजस्थान वन विभाग और विश्व वन्यजीव कोष (WWF) के संयुक्त प्रयास से सरिस्का टाइगर रिजर्व में एक महत्वपूर्ण रेप्टर सर्वेक्षण किया गया। यह सर्वेक्षण 26 फरवरी से 2 मार्च 2025 तक चला, जिसका उद्देश्य सरिस्का सहित टहला, अकलगढ़, तालाबगढ़ और बफर जोन में विभिन्न रेप्टर (शिकारी पक्षी) प्रजातियों की उपस्थिति और उनके आवास का गहन अध्ययन करना था।

इस दौरान कई दुर्लभ और विलुप्ति की कगार पर खड़ी प्रजातियों को देखा गया, जिनमें रेड हेडेड वल्चर, इंडियन वल्चर और इजिप्शियन वल्चर प्रमुख रहे। इन गिद्धों को विश्व स्तर पर संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है और यह अध्ययन इनकी संख्या और गतिविधियों पर निगरानी रखने में सहायक होगा। इसके अलावा, इस सर्वेक्षण में शॉर्ट-टूड स्नेक ईगल, बोनर रीयूसेड, शंकर फाल्कन, इंडियन स्कोप्स आउल, यूरेशियन केस्टरेल, व्हाइट आईड बजर्ड, यूरेशियन स्पैरोहॉक और वेस्टर्न मार्श हेरियर जैसी कई महत्वपूर्ण प्रजातियों की उपस्थिति भी दर्ज की गई।

सरिस्का बाघ परियोजना केफील्ड डायरेक्टर संग्राम सिंह और डीएफओ अभिमन्यु सहारण ने बताया कि यह सर्वेक्षण सरिस्का में पाए जाने वाले रेप्टर प्रजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण आवास के रूप में रिजर्व के पारिस्थितिक महत्व को दर्शाता है। यह अध्ययन भविष्य में सरिस्का टाइगर रिजर्व की लक्षित संरक्षण रणनीतियों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, जिससे गिद्धों और अन्य शिकारी पक्षियों के लिए संरक्षित पर्यावरण तैयार किया जा सकेगा।

गिद्धों का पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि वे प्राकृतिक सफाईकर्मी के रूप में कार्य करते हैं और पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में मदद करते हैं। सरिस्का में इनकी उपस्थिति वन्यजीव संरक्षण के लिए एक शुभ संकेत है, लेकिन इनकी घटती संख्या चिंता का विषय बनी हुई है। इस अध्ययन से मिलने वाले डेटा का उपयोग इन पक्षियों के संरक्षण के लिए नई योजनाएं बनाने और उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने में किया जाएगा।

वन विभाग और WWF के इस संयुक्त प्रयास से उम्मीद है कि भविष्य में सरिस्का गिद्धों और अन्य रेप्टर प्रजातियों के लिए एक सुरक्षित अभयारण्य के रूप में विकसित होगा, जहां ये संकटग्रस्त पक्षी अपनी प्राकृतिक जीवनशैली को बनाए रखते हुए सुरक्षित रूप से रह सकेंगे।

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