इंदरगढ़ बना वन्यजीवों का लाइफलाइन कॉरिडोर, WWF-India की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
रणथंभौर से रामगढ़ विषधारी तक जुड़ रहा जंगलों का नेटवर्क, 28 लेपर्ड और 22 प्रजातियों की मौजूदगी से बढ़ी संरक्षण की उम्मीद

2 अप्रैल 2026
नेचर टाइम्स डेस्क,
राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित इंदरगढ़ रेंज को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण खुलासा सामने आया है, जहां WWF-India और Rajasthan Forest Department की संयुक्त अध्ययन रिपोर्ट ने इसे वन्यजीवों के लिए एक बेहद अहम कॉरिडोर और आवास क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है, जो न केवल मांसाहारी जीवों के लिए सुरक्षित ठिकाना है बल्कि बड़े वन क्षेत्रों के बीच आवाजाही का महत्वपूर्ण मार्ग भी साबित हो रहा है।

जयपुर में 23 मार्च 2026 को आयोजित एक कार्यक्रम में “Status of Carnivores and Other Terrestrial Mammals in the Indergarh Buffer of Ramgarh Vishdhari Tiger Reserve” नामक इस रिपोर्ट को जारी किया गया, जिसमें इंदरगढ़ रेंज की पारिस्थितिक भूमिका को विस्तार से बताया गया है। यह क्षेत्र रणथंभौर टाइगर रिजर्व और रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करता है, जिससे वन्यजीवों की आवाजाही और दीर्घकालिक संरक्षण को मजबूती मिलती है। इस अवसर पर वन विभाग और WWF-India के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में रिपोर्ट के निष्कर्ष साझा किए गए, जिसमें के सी ए अरुण प्रसाद (मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक) ने कहा कि यह अध्ययन भविष्य की संरक्षण रणनीतियों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा और रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व सहित पूरे लैंडस्केप के बेहतर प्रबंधन में मदद करेगा।

अध्ययन के अनुसार अप्रैल–मई 2024 के दौरान कैमरा ट्रैप सर्वे में इंदरगढ़ रेंज में 22 जंगली स्तनधारी प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई, जहां कुल 1696 ट्रैप नाइट्स में 4334 स्वतंत्र रिकॉर्ड सामने आए। इनमें नीलगाय, जंगली सूअर और भारतीय खरगोश जैसे शाकाहारी जीव सबसे अधिक देखे गए, जबकि मोर, साही और सांभर जैसे अन्य जीव भी बड़ी संख्या में दर्ज किए गए। सबसे अहम बात यह सामने आई कि इस क्षेत्र में तेंदुओं की एक स्थिर और स्वस्थ आबादी मौजूद है, जहां 28 वयस्क लेपर्ड दर्ज किए गए और इनकी घनत्व दर 5.76 प्रति 100 वर्ग किलोमीटर आंकी गई, जो इस क्षेत्र की पारिस्थितिक मजबूती को दर्शाती है। इसके साथ ही अध्ययन में यह भी सामने आया कि धारीदार लकड़बग्घा वन क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है, सुनहरा सियार मानव गतिविधियों वाले क्षेत्रों में पाया जाता है, जबकि भारतीय लोमड़ी झाड़ीदार इलाकों में निवास करती है, जो इस क्षेत्र की जैव विविधता और आवास विविधता को दर्शाता है।

रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि इंदरगढ़ क्षेत्र पर कई तरह के दबाव बढ़ रहे हैं, जिनमें सड़कों और रेलवे जैसी लाइनर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं, खनन गतिविधियां और प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन शामिल हैं, जो वन्यजीवों के आवास और उनकी आवाजाही पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन चुनौतियों का समय रहते समाधान नहीं किया गया, तो इस महत्वपूर्ण कॉरिडोर की पारिस्थितिक भूमिका कमजोर हो सकती है।
WWF-India के डॉ. कमलेश के. मौर्य, जिन्होंने इस अध्ययन का नेतृत्व किया, ने बताया कि इंदरगढ़ रेंज न केवल तेंदुओं बल्कि अन्य संकटग्रस्त वन्यजीवों के लिए भी एक महत्वपूर्ण कड़ी है और यह रणथंभौर तथा मुकुंदरा हिल्स जैसे प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों को जोड़ते हुए पूरे लैंडस्केप में जैविक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रही है।
कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि इंदरगढ़ रेंज केवल एक वन क्षेत्र नहीं, बल्कि राजस्थान के वन्यजीव संरक्षण की रीढ़ बनकर उभर रही है, और इसके संरक्षण के लिए अब बड़े स्तर पर ठोस और समन्वित प्रयासों की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह प्राकृतिक धरोहर सुरक्षित रह सके।


