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मातृ शक्ति को सलाम: महिला दिवस पर राजस्थान के जंगलों में गूंजती बाघिनों की दहाड़

वन्यजीव संरक्षण में राजस्थान की बड़ी उपलब्धि, वसुंधरा राजे के दौर में मिले दो टाइगर रिजर्व आज बन रहे नई उम्मीद

जयपुर 8 मार्च 2026, International Women’s Dayअंतरराष्ट्रीय महिला दिवस केवल समाज में महिलाओं की उपलब्धियों का उत्सव भर नहीं है, बल्कि यह उस शक्ति को प्रणाम करने का भी दिन है जो जीवन को जन्म देती है, उसे संरक्षित करती है और भविष्य को दिशा देती है। प्रकृति की दुनिया में यह शक्ति बाघिनों के रूप में भी दिखाई देती है और मानव समाज में उन महिलाओं के रूप में, जो पर्यावरण और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं। राजस्थान में आज बाघों की गूंजती दहाड़ और जंगलों की बढ़ती हरियाली इसी मातृ शक्ति की कहानी कहती है।


संयोग से आज का दिन राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के जन्म दिवस के रूप में भी जाना जाता है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कई विशेषज्ञ मानते हैं कि उनके कार्यकाल में राजस्थान को दो महत्वपूर्ण टाइगर रिजर्व—मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व और धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व—की सौगात मिली। भले ही इन परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन में कई स्तरों पर प्रयास हुए हों, लेकिन यह भी माना जाता है कि उस समय लिए गए निर्णयों ने राजस्थान के वन्यजीव भविष्य को एक नई दिशा दी।

 

आज कई उतार-चढ़ाव और चुनौतियों के बाद यह दोनों टाइगर रिजर्व फिर से जीवन से भरते दिखाई दे रहे हैं। जहां कभी बाघों की मौजूदगी को लेकर संशय था, वहीं अब जंगलों में उनकी गतिविधियां बढ़ती हुई दिखाई देती हैं। इन जंगलों को आबाद करने में जिन बाघिनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उन्हें भी इस अवसर पर याद किया जाना जरूरी है।
मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व की कहानी संघर्ष और उम्मीद दोनों की कहानी है। इस रिजर्व को सबसे पहले बसाने वाली बाघिन MT-2 थी। उसने जंगल में नई शुरुआत की, लेकिन दुर्भाग्य से उसके शावक जीवित नहीं रह पाए। इसके बाद आई MT-4 के शावकों को भी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। ऐसा लगा जैसे मुकुंदरा की किस्मत बार-बार परीक्षा ले रही हो। लेकिन जंगल का स्वभाव हार मानना नहीं है। समय के साथ यहां लाई गई अन्य बाघिनों ने इस क्षेत्र को फिर से जीवंत कर दिया और आज मुकुंदरा का जंगल फिर बाघों की हलचल से आबाद होता दिखाई देता है।
वन्यजीव मामलों के जानकार अनिल रोजर्स बताते हैं कि धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व भी अब बाघों की गतिविधियों से समृद्ध होता जा रहा है। चंबल और डांग क्षेत्र के जंगलों में फैला यह इलाका जैव विविधता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां बाघों की मौजूदगी न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि संरक्षण के प्रयास धीरे-धीरे सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं।
अगर राजस्थान के वन्यजीव इतिहास को देखा जाए तो सरिस्का टाइगर रिजर्व की कहानी सबसे प्रेरक मानी जाती है। एक समय ऐसा भी था जब सरिस्का पूरी तरह बाघविहीन हो गया था। यह घटना केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चिंता का विषय बन गई थी। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संरक्षण नीति और वन विभाग के प्रयासों से सरिस्का में बाघों का पुनर्वास किया गया। आज वही सरिस्का फिर बाघों की दहाड़ से गूंज रहा है और यह भारत में सफल टाइगर पुनर्वास का एक उदाहरण बन चुका है।

अब उम्मीदें राजस्थान के एक और ऐतिहासिक जंगल से जुड़ी हैं—प्रस्तावित कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व से। अरावली पर्वतमाला के बीच फैला यह विशाल वन क्षेत्र 1970 के दशक में बाघों की मौजूदगी के लिए जाना जाता था। समय के साथ यहां बाघों की संख्या कम हो गई, लेकिन आज फिर से इस क्षेत्र में बाघों को बसाने की संभावना पर चर्चा हो रही है। यदि यह योजना साकार होती है तो कुंभलगढ़ भी राजस्थान के वन्यजीव मानचित्र पर एक नई पहचान बना सकता है।

महिला दिवस के अवसर पर यह कहानी केवल नीतियों और योजनाओं की नहीं है, बल्कि मातृ शक्ति की भी है। जंगलों को आबाद करने वाली बाघिनें हों या वन विभाग में कार्यरत महिला अधिकारी, वन रक्षक और पर्यावरण कार्यकर्ता—इन सभी ने प्रकृति को बचाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज राजस्थान में बड़ी संख्या में महिलाएं वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं और यह एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है।

आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट की चुनौतियों से जूझ रही है, तब राजस्थान की यह कहानी उम्मीद जगाती है। यह बताती है कि अगर इच्छाशक्ति, नीति और संरक्षण का संकल्प मजबूत हो तो सूखे और कठोर भूभाग वाले प्रदेश में भी जंगलों को फिर से जीवन से भरना संभव है।

नेचर टाइम्स अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इस विशेष अवसर पर उस मातृ शक्ति को नमन करता है—

उन बाघिनों को, जिन्होंने जंगलों को आबाद किया…

उन महिलाओं को, जो जंगलों की रक्षा कर रही हैं…

और उन सभी लोगों को, जिन्होंने प्रकृति और वन्यजीवों को बचाने का संकल्प लिया है।

राजस्थान के जंगलों में गूंजती बाघों की दहाड़ आज यही संदेश देती है कि जब संकल्प मजबूत हो, तो प्रकृति भी फिर से मुस्कुराने लगती है।

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