करोड़ों पौधे, हजारों हेक्टेयर में हरियाली का दावा… जमीनी सच्चाई क्या कहती है राजस्थान के जंगलों की?
राज्यभर के वन क्षेत्रों में बड़े स्तर पर पौधारोपण, जल संरक्षण और जैव विविधता सुधार के लिए ₹1600 करोड़ से अधिक की योजनाएं जारी, फिर भी वन आवरण और घने जंगलों का विस्तार चुनौती बना हुआ

ο सुमित जुनेजा ο
राजस्थान में वानिकी विकास को लेकर हाल के वर्षों में बड़े स्तर पर गतिविधियां सामने आई हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि राज्य के विभिन्न वन क्षेत्रों में बहुआयामी स्तर पर काम किया जा रहा है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार राज्य के अलग-अलग वन मंडलों, रेंजों और संरक्षित क्षेत्रों में पौधारोपण, जल संरक्षण, जैव विविधता सुधार और वन्यजीव आवास विकास से जुड़े कार्य लगातार संचालित किए जा रहे हैं। इन गतिविधियों का विस्तार केवल योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में इनका असर भी दिखाई देने लगा है।
राज्य के दक्षिणी वन क्षेत्रों जैसे उदयपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और सिरोही के साथ-साथ अरावली क्षेत्र के विभिन्न वन खंडों में पौधारोपण और वन पुनर्जीवन के कार्य किए गए हैं। वहीं पूर्वी राजस्थान और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में भी वानिकी गतिविधियों को बढ़ाया गया है, जहां प्राकृतिक परिस्थितियां अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण मानी जाती हैं। इन सभी क्षेत्रों में 11 करोड़ से अधिक पौधारोपण और 27 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में वृक्षारोपण कार्य किए जाने के साथ-साथ कई स्थानों पर अवनत वन क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए गए हैं।

इन कार्यों के अंतर्गत केवल पारंपरिक पौधारोपण तक सीमित न रहकर Assisted Natural Regeneration (ANR), enrichment plantation और घासभूमि विकास जैसे उपाय अपनाए गए हैं। कई वन क्षेत्रों में स्थानीय प्रजातियों को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिससे क्षेत्रीय पारिस्थितिकी को मजबूत किया जा सके और वन क्षेत्र की गुणवत्ता में सुधार हो सके। जल संरक्षण के क्षेत्र में भी राज्य के अलग-अलग वन क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर कार्य किए गए हैं। विभिन्न रेंजों में चेक डैम, कंटूर ट्रेंच, गैबियन संरचनाएं, परकोलेशन टैंक और अन्य जल संचयन इकाइयों का निर्माण किया गया है। इनका उद्देश्य वन क्षेत्रों में नमी बनाए रखना, पौधों की जीवित रहने की दर को बढ़ाना और वन्यजीवों के लिए जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। कई स्थानों पर पारंपरिक जल स्रोतों के पुनरुद्धार के प्रयास भी किए गए हैं।

वन विकास कार्यक्रमों में जैव विविधता संरक्षण को भी प्राथमिकता दी गई है। विभिन्न वन क्षेत्रों में माइक्रो फॉरेस्ट, घासभूमि विकास, ओरण संरक्षण और वन्यजीव आवास सुधार जैसे कार्य किए जा रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वन विकास को एक व्यापक पारिस्थितिकी दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए livelihood improvement, community mobilization और skill development जैसे कार्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं, ताकि वन संरक्षण को सामाजिक और आर्थिक आधार मिल सके। वित्तीय स्तर पर देखें तो इन सभी गतिविधियों के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया गया है। विभिन्न योजनाओं के माध्यम से ₹1600 करोड़ से अधिक की परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनमें वनीकरण, जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण, आधारभूत ढांचा विकास और मानव संसाधन सुदृढ़ीकरण जैसे कार्य शामिल हैं। CAMPA सहित अन्य योजनाओं के तहत भी विभिन्न वन क्षेत्रों में compensatory afforestation और पुनर्स्थापन कार्य किए जा रहे हैं।

इन सभी प्रयासों के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी सामने आता है कि राज्य का बड़ा हिस्सा अभी भी कम घनत्व वाले वन क्षेत्रों में आता है और घने जंगलों का विस्तार सीमित बना हुआ है। भौगोलिक परिस्थितियां, कम वर्षा, उच्च तापमान और मरुस्थलीय विस्तार जैसे कारक वन विकास की गति को प्रभावित करते हैं। यह स्थिति यह संकेत देती है कि योजनाओं और निवेश के साथ-साथ उनके दीर्घकालिक प्रभाव और गुणवत्ता पर भी समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है।
उपलब्ध तथ्यों और जमीनी गतिविधियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि वन विकास को लेकर राज्य में प्रयास व्यापक स्तर पर किए जा रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों की वास्तविक दिशा और परिणाम आने वाले समय में अधिक स्पष्ट हो पाएंगे। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि क्या ये प्रयास वास्तविक और घने जंगलों के रूप में सामने आएंगे या वन विकास की तस्वीर आंकड़ों तक ही सीमित रह जाएगी।
क्या राजस्थान में चल रहे ये व्यापक वन विकास कार्य आने वाले समय में जमीन पर भी घने जंगलों का रूप ले पाएंगे?




