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‘टाइगर स्टेट’ पर दाग! मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बाघों का अवैध शिकार, RTI ने खोली चौंकाने वाली परतें

2005 से 2025 के बीच देशभर में लगभग 200 बाघों के अवैध शिकार का खुलासा

सुमित जुनेजा,

23 फरवरी 2026, ‘टाइगर स्टेट’ का नाम आते ही सबसे पहले दिमाग में मध्यप्रदेश की छवि उभरती है। देश में सबसे ज्यादा बाघों की मौजूदगी के कारण यह राज्य वर्षों से गौरव का प्रतीक रहा है। लेकिन हाल ही में सामने आई एक आरटीआई रिपोर्ट ने इस गौरवशाली छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस राज्य को बाघ संरक्षण की मिसाल माना जाता है, वहीं पिछले दो दशकों में बाघों के अवैध शिकार के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। यह खुलासा केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो (WCCB) से प्राप्त सूचना के अधिकार के जवाब में हुआ है।

फोटो : संदीप दत्ता

आरटीआई के अनुसार, वर्ष 2005 से 2025 के बीच पूरे भारत में लगभग 200 बाघों का अवैध शिकार हुआ। यह आंकड़ा अपने आप में चिंताजनक है, लेकिन उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से 59 मामले मध्य भारत के जंगलों से जुड़े हैं। इन 59 मामलों में अकेले मध्य प्रदेश में 36 बाघों का अवैध शिकार दर्ज किया गया। यानी देश में सबसे अधिक बाघों वाला राज्य ही अवैध शिकार का भी बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। सूची में मध्य प्रदेश के बाद उत्तर प्रदेश का नाम सामने आया है।

मध्य भारत के जंगल—चाहे वे बांधवगढ़ नेशनल पार्क हों, कान्हा टाइगर रिजर्व या पेंच और सतपुड़ा के विस्तृत वन क्षेत्र—देश के लिए बाघ संरक्षण के मजबूत गढ़ माने जाते हैं। यही क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ‘टाइगर लैंडस्केप’ के रूप में पहचाने जाते हैं। लेकिन तस्करी के संगठित नेटवर्क, बाघों की खाल और हड्डियों की अंतरराष्ट्रीय मांग, और सीमावर्ती राज्यों से जुड़ी तस्करी की कड़ियों ने इन जंगलों को अपराधियों के निशाने पर ला खड़ा किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जहां बाघों की संख्या अधिक होती है, वहां शिकारियों की नजर भी ज्यादा रहती है। बाघ संरक्षण के लिए मजबूत गश्त, तकनीकी निगरानी, मुखबिर तंत्र और अंतरराज्यीय समन्वय जरूरी है। पिछले वर्षों में कैमरा ट्रैप, ड्रोन सर्विलांस और स्पेशल टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स जैसी पहलें की गई हैं, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जमीनी स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं।

फोटो: संदीप दत्ता

यह रिपोर्ट केवल एक राज्य पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि देशव्यापी संरक्षण व्यवस्था की समीक्षा की मांग करती है। जब एक ओर भारत वैश्विक मंच पर बाघ संरक्षण की सफलता का दावा करता है, तब दूसरी ओर अवैध शिकार के ये आंकड़े एक कड़वी सच्चाई सामने रखते हैं। अब जरूरत है कि ‘टाइगर स्टेट’ का तमगा केवल संख्या तक सीमित न रहे, बल्कि सुरक्षा और संरक्षण के मानकों पर भी वह उदाहरण बने। बाघ केवल जंगल की शान नहीं, बल्कि हमारे पारिस्थितिकी संतुलन की धुरी हैं—और उनकी सुरक्षा अब सबसे बड़ी परीक्षा बन चुकी है।

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